नई दिल्ली, गुजरात में जीका नामक वायरस आया और घर से लेकर बाहर तक सब जगह सिर्फ एक ही बात थी, कि परन्तु ये किसी को नहीं पता कि ये जीका है क्या ? इस पर आज चर्चा आवश्यक हो गयी है, यह वायरस फलाविविरिडए विषाणु परिवार से है, इस परिवार में और भी वायरस है जो मानव जीवन काे बीमार बनाता है, 1947 में यूगांडा के एक जंगल में एक बन्दर पर परिक्षण करने के पश्चात् एक वायरस मिला, जिसका नाम जीका रखा गया। सन् 1952 में ये वायरस इंसान के शरीर में भी पाया गया, अब समय था जब वायरस ने धरती पर अपने पैर पसारने प्रारम्भ किया। 1960 से 1980 तक के दशक में यह वायरस यूरोप से निकल कर अफ्रीका तक आ पहुंचा और 2007 में एशिया में प्रवेश कर गया। यह वायरस उसी प्रजाति का सदस्य है जिसका एडिज नामक वायरस सदस्य है और एडिज नामक वायरस के कारण ही चिकगुनिया, डेंगू जैसी बीमारी होती है, ये वायरस भी मच्छर के काटने पर ही शरीर में प्रवेश करता है, यह मच्छर सुबह या शाम को भारत में ही काट सकता है क्याें कि दिन में सूर्य की गर्मी इतनी तेज होती है कि यह जीवित नहीं रहता है ।
क्यों काटता है ये मच्छर : नर मच्छर कभी भी नहीं काटता है परन्तु मादा मच्छर को मां बनने के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है अत: वो मानव शरीर से प्रोटीन लेने के लिए काटते हैं ।
लक्षण : डेंगू की तरह ही इसके काटने से पहले बुखार आता है और जोडो में दर्द होने लगता है, फिर सिरदर्द, लाल चकत्ते तथा आॅखे लाल हो जाती है ठीक वैसे ही जैसे चिकनगुनिया में होता है, अर्थात् ऑखे लाल हो जाना ही सिर्फ अलग से होता हैैै, वायरस का जीवन चक्र : एडीज एजिप्टी वयस्क मच्छर लगभग 100 से 200 अंडे एक बार में दे सकता है, ये गंदे तथा ठहरे हुए पानी में ही पनपता है, इसके अतिरिक्त कंटेनर, बर्तन, पुराने टायर में पानी भरा है तो वहां पर भी ये पनपता है। अंडे जब फूटते है तो लार्वा शैवाल जैसे पानी में मौजूद सामग्रियो पर मोटे तौर पर चार दिनों तक जीवित रहते हैं, फिर कुछ दिनों के लिए लार्वा प्यूपा चरण में प्रवेश कर जाता है, वो वयस्क उडने वाले मच्छर रूप में उभरते हैं। ये मच्छर लम्बी दूरी तय नहीं कर पाता है सिर्फ 400 मीटर तक ही यात्रा कर सकता है।
उपचार क्या है :भारतीय वैज्ञानिक स्व. श्री राजीव दीक्षित जी के द्वारा सूर्य की तेज गर्मी के कोई भी वायरस 27 दिन से ज्यादा जीवित ही नहीं रह सकता है। एजिप्टी मच्छर जब किसी बीमार व्यक्ति को काटता है तो जीका, डेंगू या अन्य वायरस के साथ मानव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, यदि मच्छर काटने के लिए कोई संक्रमित व्यक्ति नहीं है तो कोई भी वायरस आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर पाता। जबकि संक्रमित मच्छर के भीतर वायरस आने में पांच से सात दिन का समय लगता है फिर ये वायरस मच्छर की लार के साथ मानव शरीर में प्रवेश कर जाता है। परन्तु यदि आपके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा है तो ये वायरस निक्रिय हो जाता है। येे अनुभव गुरूकुल के नाडी विशेषज्ञ वी. के. चौधरी जी का है उनका कहना है कि जिस व्यक्ति के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होगी वो इस वायरस की चपेट में नही आता है आप सब अपने अनुभव से भी कह सकते हो कि यह वायरस ने 20 वर्ष के उस व्यक्ति को कम पकडा परन्तु 40 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले को बहुत प्रताडित किया है। महासुदर्शन वटी, पुर्नादिवटी मण्डूर, गौ अर्क, गिलोय का जूस के साथ इसका उपचार किया जा सकता है। वैसे चौधरी जी का कहना है कि यदि आप पपीता, नारियल पानी, पना, त्रिफला रात्रि में दूध के साथ लेते रहे अर्थात् पेट को साफ रखे न तो कब्जियत होने दे और न ही अपच होने दे तो भी इस वायरस से बचा जा सकता है। इसी प्रकारवैज्ञानिक स्व. श्री राजीव दीक्षित जी ने भी आयुर्वेद से दवा बताई है 20 पत्ते तुलसी, नीम की गिलोई का सत् 5 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम, 10 छोटी पीपर के टुकडे का काढा बनाकर तीन खुराक देने से चिकनगुनिया समाप्त हो जाता है ।
बचाव : फैशन के दौर में यह बात कहना तो अतिशेक्ति होगी परन्तु मच्छर सदैव गहरे रंग की तरफ पहले बढता है जैसे आप के काले बाल देखकर वो बालों पर उडने लगता है, तो अगर आप ने गहरे रंग के कपडे न पहन कर ढीले और हल्के कलर के कपडे पहन रखे हैं तो निश्िचत आप इससे बचाव हो सकता है। पपीता, नारियल पानी, पना, त्रिफला रात्रि में दूध के साथ लेते रहे अर्थात् पेट को साफ रखे न तो कब्जियत होने दे और न ही अपच होने दे तो भी इस वायरस से बचा जा सकता है।
उपसंपादक: सत्यम् लाइव
Leave a Reply