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कर्म की कुशलता ही मंगलकारी योग है।

सत्यम् लाइव, 21 जून 2022 दिल्ली।। योग दिवस पर ही नहीं बल्कि सदैव ही योग को मंगलकारी होता है अतः प्रतिदिन नहीं बल्कि प्रतिक्षण योग करें। अब ये बहुत बड़ी विश्वस्ता है कि प्रतिक्षण योग कैसे करें? तो इसके लिये आपको शारीरिक ज्ञान नहीं बल्कि योग का ग्रन्थों से ज्ञान स्वयं लेना पड़ेगा। सर्वप्रथम तो योग का अर्थ है जोड़ना। भगवान कृष्ण ने गीता में सही दिनचर्या को योग बताया है

‘‘युक्ताहारविहारस्य युक्ताचेष्टास्य कर्मसु। युक्तास्वप्नाबोध्स्य योगो भवति दुःखहा।।  (अ-6-17)

                खानपान, कर्म की शुद्धि, सोने-जागने तथा उठने-बैठने का नियम यदि उचित नहीं है तो यही योग आपको दुःख देने वाला होगा। इसी आधार के जोड़ को अष्टांग योग के नाम पूरा वर्णन मिलता है जिसे आठ भागों में बॉटा गया है – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि।

आज की शिक्षा व्यवस्था के दौरान जो पाठ्य क्रम है उसमें योग मात्रा शारीरिक व्यायाम रह गया है और कुछ नहीं और सभी को प्राणायाम कराया जा रहा है प्रारम्भ में यम के अंगों में अहिन्सा, सत्य, अस्तेय, असंग, लज्जा, अपरिग्रह, आस्तिकता, ब्रह्मचर्य, मौन, स्थिरता, क्षमा और अभय आदि का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् मानसिक, शारीरिक और वाचिक (मन, क्रम और वचन) मानव पूर्ण निरोगी जीवन यापन करता है।

परन्तु आज हर योगाचार्य यम, नियम, आसन को त्यागकर सीधा प्राणायाम कराता है और उसे ही योग का नाम दे दिया गया है। प्रत्याहार पर जब किसी योगाचार्य से बात करो तो ज्ञात होता है कि वो उसका स्वयं का प्रत्याहार ही ठीक नहीं है तो वो दूसरे को क्या बताये? धारणा के विषय कुछ समझा तो ज्ञात हुआ कि योगाचार्य स्वयं ही राजनीति में बने रहने के लिये योग कर रहे हैं और तो और आपस में बच्चों की तरह स्वयं को अब्वल दिखाने के लिये लड़ भी रहे हैं।

ध्यान सभी कर रहे हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे तुलसीदास जी ने कहा था कि ‘‘माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख मांहि । मनुआ तो चहुं दिसि फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं ।।  मन के विचरण का नाम ही वृत्ति है जबकि हृदय के विचार को चित्त कहा जाता है और मन की वृत्ति उन पाँच शत्राओं को जन्म देती है जो माया के सेनापति कहे गये हैं,  ’’ परन्तु बुरा नहीं मानना चाहिए क्योंकि कलयुग में ऐसा होता है। जगह जगह बोर्ड लगे हैं और कलयुगी ज्ञानीजन ‘‘राजयोग’ करा रहे हैं जबकि ये राजयोग नहीं बल्कि ‘‘राजयोग समाधि’ है। जिसको किसी को सत्य और अहिन्सा को नहीं जानता है वो राजयोग कराकर पैसा कमाया जा रहा है। प्रश्न अब भी खड़ा है कि क्या जीवन अपिरग्रह के ज्ञान के बिना प्राणायाम हो सकता है यदि नहीं तो ध्यान और समाधि लगाकर क्यों स्वयं को धोखा दे रहे हो

सुनील शुक्ल

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