प्रकृति-पर्यावरण रक्षक एवं सृष्टि संचालक है नाइट्रोजन-हाइड्रोजन

सत्यम् लाइव, 4 अप्रैल 2023, दिल्ली।। एन-3 एच-2 नाम का वायरस पुनः पृथ्वी पर आने के संकेत भारत को डब्लूएचओ से मिल रहा है लगातार ये कहा जा रहा है कि ये नया वायरस मानव के लिये खतरा है। दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द्र केजरीवाल ने तो यहॉ तक कहा कि जो अब तक वैक्सीन लगवा चुके है उन पर भी ये वायरस असर दिखा रहा है। ये धर्म की गणित के अनुसार समझा जाये या फिर अधर्म की आड़ का षड़यत्र कहा जायेगा। जो बाबा रामदेव तक दबी जबान से कह चुके हैं। इस पर तो फैसला तभी हो सकता है जब आप स्वयं इस संक्रमण को वैसे ही समझें, जैसे ‘‘सौर कोरोना के परिचय’’ के लेख के तहत् पर समझा था।

एन & एच का नाम सामने आते ही ये आवश्यक है कि रसायन शास्त्र को ब्रम्हाण्ड के परिवेश के आधार पर समझा जाये। ब्रम्हाण्ड के आधार पर समझने के बाद भारतीय परिवेश के आधार पर समझना बहुत कुछ सरल हो जाता है। ऋतुओं के अनुसार स्वयं के परिवेश से किसी भी संक्रमण, कीटाणु, वायरस को समाप्त किया जा सकता है क्योंकि कीटाणु देशान्तर और अक्षांश के अनुसार जन्म लेता और मरता रहता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार किसी भी वायरस को समाप्त करने के लिये सर्वप्रथम अलग-अलग स्थलों के पर्यावरण को समझना होगा। इसके बावजूद भी यदि कोई कीटाणु मानव शरीर में प्रवेश कर जाता है तो उस मानव के शरीर में उपस्थिति रक्षक जीवाणु उसकी रक्षा करते हैं फिर प्रकृति एवं पर्यावरण के अनुसार सात्विक भोजन उन कीटाणु को समाप्त करता है।

प्राकृतिक सुरक्षा चक्र, प्रत्येक जीव की रक्षा करने का दायित्व पहले उठाता रहा है ये कार्यभार सृष्टि ने उसे सौंप है। सुरक्षा चक्र इस कार्यभार को युगां-युगों से निभाता आया है और आगे भी निभाता रहेगा। मानव की अत्याधिक पाने की लालसा ने, उपभोगवादी विज्ञान को जन्म दिया। आज की परिस्थितियों में, इस उपभोगवादी विज्ञान को अपनाकर मानव स्वयं को ही सिर्फ मानसिक सुख देता हुआ पश्चिमी सभ्यता को अपनाता है।

अध्यात्मवादी विज्ञान में धर्म रक्षक बन मानव प्रकृति और पर्यावरण के समस्त योग में जीवन यापन करता हुआ, अपरिग्रह अपनाता हुआ, आनन्दमय जीवन यापन करता है क्योंकि अध्यात्मवादी विज्ञान में चार आयु का वर्णन मिलता है। 1. सुखायु 2. दुःखायु 3. अहितायु और 4 हितायु। इसमें से सर्वश्रेष्ठ हितायु आयु को कहा गया है। बस इतना छोटा सा कारण है सनातनी परम्परा को दुनिया की श्रेष्ठ परम्परा कहा जाने का। हितायु जीवन यापन करने वाला स्वयं भूखा भले ही रहे परन्तु किसी अजनबी को भी भरपेट भोजन कराता है। भण्डारा कराकर हमारे यहॉ का हर व्यक्ति आनन्दमयी हो जाता है।

उपभोगवादी विज्ञान ही कीटाणु को जन्म देती हैं क्योंकि प्रकृति एवं पर्यावरण की रक्षा के बिना जो विज्ञान उन्नति करता है उसे ही उपभोगवादी विज्ञान कहा जाता है। इसी को आज विज्ञान की उन्नति माना जा रहा है। आज की इसी विज्ञान से एन3एच2 को यदि समझने का प्रयास करें तो एन अर्थात् नाइट्रोजन को समझना होगा। रसायन विज्ञान के अनुसार नाइट्रोजन एक रसायनिक तत्व है जिसे उपभोगवादी विज्ञान में परमाणु 7 के अन्तर रखा गया है। पृथ्वी के वायुमण्डल में लगभग 78 प्रतिशत नाइट्रोजन उपलब्ध है। साथ ही यह रंगहीन, गंध्हीन और स्वादहीन अक्रिय गैस है। इसको नाइट्रोजन नाम अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था में स्कॉटलैण्ड के डिनियल रदरपफोर्ड ने 1773 में दिया। वैसे कुछ तथ्य कहते हैं कि 1790 में इसका नाम अंग्रेजी में रखा गया।

नाइट्रोजन प्रकृति एवं पर्यावरण के लिये बहु उपयोगी गैस है। नाइट्रोजन को अनेक यौगिक विस्फोटक (ट्राइनाइट्रोजन, ट्राइनाइट्रोटोलूर्डन) के काम में लिया जाता है। हवाई जहाज के टायर में तथा बिजली के बल्व में भी इस गैस का प्रयोग किया जाता है। अनेक दिव्य औषधियों की दाता भी है नाइट्रोजन गैस। जैव पदार्थों में यह आवश्यक चक्र स्वरूप में वनस्पति खाद्य का निर्माण कर, मनुष्य और पशुओं के जीवन में अति आवश्यक भी है। मिट्टी में अंसख्य जीवाणु की निर्माता,

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वायु से कार्बानिक पदार्थ में परिणित करते हुए करती है। कुछ शिम्बी पौधों से सीधे नाइट्रोजन यौगिक क्रिया करते हैं। वर्षा के जल के साथ एन 3 व नाइट्रिक ऑक्साइड, विद्युत विसर्जन द्वारा नाइट्रोजन ही प्राप्त होती है। दलहन की फसलों की जड़ों में राइजोबिअम नामक जीवाणु उत्पन्न होकर ऑक्सीजन के साथ क्रिया करके पुनः मुक्त नाइट्रोजन चक्र चलाने में सहयोगी होता है।

1907 से 1920 के बीच बढ़ती औद्योगिकी करण में एन और एच का प्रयोग कई जगह पर किया जाने लगा और इस नाइट्रोजन के चक्र में उत्पन्न होने वाली गैस को धीरे-धीरे विसैली बनाया जाने लगा, उपभोगवादी विज्ञान को इसी कारण से, मैं प्रकृति और पर्यावरण का विरोधी विज्ञान कहता हूॅ। जबकि
नाइट्रोजन + हाइट्रोजन = अमोनिया + 24,000 कैलोरी ऊर्जा
N2 + H2 = NH3 + 24,000 कैलोरी ऊर्जा

हाइड्रोजनः- रसायन विज्ञान की आवर्त सारणी में प्रथम तत्व के रूप में हाइड्रोजन को स्थान दिया गया है। ब्रम्हाण्ड के पंचतत्वों में से एक आवश्यक तत्व का निर्माता है जिसे जल तत्व कहा गया है। सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड के जल की आवश्यकता है तथा मानव शरीर में रस के रूप में पूरे शरीर में फैला हुआ रहता है तथा विषाक्त पदार्थों या शरीर से कचरे को बाहर निकालने में परम् सहयोगी के रूप में कार्य करता है। पाचन क्रिया में स्वस्थ रहने तथा मस्तिष्क को स्वस्थ रखकर, परम् विचारक तक की अवस्था में सहयोगी है ये शुद्ध जल तत्व। ये आज का विज्ञान ही नहीं बल्कि वेदों से भी प्रमाणित है। वैसे हाइड्रोजन का नाम 1766 में हेनरी केवेडिस ने अंग्रेजी में रखा।

हाइड्रोजन का अर्थ जल का उत्पादक बताया गया है। जबकि संस्कृत में उदन् और हिन्दी में उदान का जनक कहा गया है। इसी कारण से आज की विज्ञान में इसे डिहाइड्रेशन नामक बीमारी से जोड़ा गया है और ये शब्द आज के मेडिकल डॉक्टर के मुख से हम सब बहुत सुनते हैं परन्तु वास्तविक हिन्दी में यदि समझें तो सामान्यतया पेट में होने वाले रोगों में पाचन क्रिया में जल तत्व का बढ़ने या घटने को डिहाइड्रेशन कहते हैं। यदि जल बढ़ गया तो मेहनत करके या रसोई के जीरे से ठीक किया जा सकता है और यदि घट गया तो शुद्ध जल को ग्रहण करके बढ़ाया जा सकता है। नारियल पानी से बढ़ाया जा सकता है। अंगूर के सेवन से मस्तिष्क रोगों तक से छूटकारा पाया जा सकता है। देशी गाय के पंचगव्य को नाक में डालने से जो नींद पूरी होती है उससे भी मस्तिष्क की जल का स्तर ठीक होता है। आयुर्वेद में अग्नि और जल को चिकित्सा का प्रधन तत्व बताया गया है और इस तत्व की खोज पर वैश्णिवी सम्प्रदाय भगवान विष्णु का उपासक तथा शैव सम्प्रदाय भगवान शिव का उपासक हुआ करता था। इन दोनों सम्प्रदाय में भी मत-भेद का मुख्य कारण तत्व की प्रधानता पर के विचार पर ही था। कहते हैं कि इसी काल में कम्ब रामायण के लेखन से दोनों के बीच में तत्व मतभेद को समाप्त करने की सफलता प्राप्त हुई।

सुनील शुक्ल

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