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नोवेल कोरोना और व्‍यापाार

SATYAM LIVE (Web Desk) by SATYAM LIVE (Web Desk)
May 16, 2020
in भारत, सम्पादकीय
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वैदिक नारी उसी को कहा गया है जो अपनी से, अपने परिवार को अपनी रसोई से स्‍वस्‍थ रख लेती है। भारत भूमि पर सूर्य देव की कृपा से, कोई भी हिन्‍सावादी, कभी स्‍वस्‍थ नहीं रह सकता है फिर तो कोई भी बडे से बडा वायरस को, भारत में पुरूष की शक्ति कही जाने वाली, भारतीय नारी अपनी रसोई से ही, वैदिक नारी बनकर, उसको परास्‍त कर सकती है।

सत्‍यम् लाइव, 15 मई, 2020 दिल्‍ली।। आज नोवेल कोरोना जैसी महामारी, पूरे विश्‍व मुॅह खुले खडी है, जिसके कारण भारत सरकार ने, 1897 लॉकडाउन अधिनियम के तहत पर, पूरे देश में लॉकडाउन लगा रखा है। अब समय ने कुछ करवट बदली है और धीरे-धीरे लॉकडाउन में, छूट का प्रावधान आने लगा है। पहले तो इस अधिनियम के लाॅॅकडाउन के तहत पर सरकार को, स्‍वयं के मंत्री परिषद सहित, रक्षा तंत्र को लॉकडाउन और कर्फयू में अन्‍तर बताना चाहिए था तब इसकी घोषणा करनी चाहिए थी जिसके तहत पर, जनता जो घर में रहेगी उसकी सहायता कैसे करनी है और उसको किसी प्रकार की, कोई समस्‍या न आने पाये। जो जहॉ है वहीं रहे? परन्‍तु कोई भूख न रहने पाये, न कोई बीमार होने पाये। यदि किसी नागरिक को कोई परेशानी होती है तो ये लॉकडाउन की असफलता होगी। परन्‍तु दुुर्भाग्‍य ऐसा कुछ भी नहीं हुआ बल्कि उसका ठीक उल्‍टा हुआ। कोई अपने घर से बाहर दूध लेने निकला तो पुलिस ने उसे ऐसा दण्‍डों से मारा, जैसे आतंकवादी के साथ वाला रहा हो या फिर सोते हुए लोगों पर कार चढाने वाला वही हो। दूसरी तरफ और तार्जुब हुआ, जब सरकार ने, शराब की दुकानें खोलकर, भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को ठीक करने का प्रयास किया तो उसी पुलिस ने सारी सोशल डिस्टिेंसिंग को भूलकर, पुरूष की नहीं बल्कि औरतों की भी अलग लाइन लगवाई। भारत की अर्थव्‍यवस्‍था शराब से सुदृढ होगी ये भारत के इतिहास में शायद पहली बार हुआ होगा। आज तक के इतिहास में कहीं भी, ऐसा उदाहरण नहीं पढने को मिलता जब भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को, विदेशी सभ्‍यता परोसकर उभारने का प्रयास किया जाये। इस लॉकडाउन का इतिहास में, कुछ विशेष अवश्‍य देखने को मिलता है। पहले तो ये 1897 के अधिनियम के तहत पर लागू किया गया और उस समय भी 22 मार्च 1897 को इलाहाबाद में मी‍टिंग करके, लागू किया जाता है। उस समय प्‍लेग फैला हुआ है ऐसा चापेकर बन्‍धु का इतिहास बताता है। दो अंग्रेज अधिकारी वाल्‍टर चार्ल्‍स रैण्‍ड और आयर्स्‍ट, इस महामारी प्‍लेग के अधिकारी बनकर, भारत के लोगों पर अत्‍याचार कर रहे थे और सडक पर ही, किसी महिला को जलील करने केे लिये, प्‍लेग के बहाने कपडे उतरवा लेते थे तो कभी किसी पुरूष को मारतेे थे। इस तथ्‍य को लेकर बालगंगाधर तिलक ने एवं आगरकर जी ने इस व्‍यवस्‍था पर भारी आलोचना की इसी कारण से उन्‍हें जेल भेज दिया गया। अत्‍याधिक अत्‍याचार बढने पर, 22 जून 1897 को चापेकर बन्‍धुु (दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्‍ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर) ने इन दोनों अंग्रेजों का जान से मार दिया और फॉसी पर चढ गये। इन्‍दौर का इतिहास बताता है कि वहॉ पर, एक तरफ प्‍लेग फैला है तो सब को घर में, रहने की हिदायत है। किसी मेहमान को भी, किसी घर पर जाने की अनुमति नहीं है और दूसरी तरफ बिजली की योजना तथा फायर बिग्रेड की योजना क्रियान्वित की जा रही है। इस योजना से ज्ञात होता है कि सूर्य की गति के विरोध मेें, विकास चालू हो रहा है। व्‍यक्ति इसका विरोध न कर सके, इस कारण से ही लॉकडाउन है क्‍योंकि चैत्र मास में, जब सूर्य देव उत्‍तरायण काल में हों और अगस्‍त तारा उदय हो। तो तब भला कैसे, कोई भी बीमारी भारत में प्रवेश कर सकती है? अंग्रेजों के समय में यदि इस ऋतु में, प्‍लेग आ जाता है तो मान सकते हैं उस समय अंग्रेजों का शासन था और हम सब भारतीय शास्‍त्र को जानते हुए भी कुछ नहीं कर सकते थे परन्‍तु अब क्‍यों नहीं पढाया गया? भारतीय शास्‍त्र। इस पर आज तक तय ही नहीं हो पाया कि ये वायरस कितने तापमान पर जिन्‍दा रहता है? बताया गया कि चीन की गलती ये जन्‍म ले गया। तो ऐसी विकास की दौड मेें, एक दिन डायनासोर भी जन्‍म ले जायेगा। इस पर विचार क्‍यों नहीं किया जा रहा है? बल्कि इसके साथ जीने की आदत डाली जा रही है।

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डॉ. एस. बालक

भारत के हर नेता और अधिकारी यही बात रट रहे हैं कि हमें कोरोना के साथ जीना सीखना होगा? ऐसा क्‍यों ये लोग कह रहे हैं? वो भी भारत की धरा के लिये, ये बात मेरी समझ से परे है। इस विषय पर डॉ. एस. बालक से जब वर्त्‍ता हुई तो उन्‍होंने विशलेषण करते हुए कहा कि डब्ल्यू.एच.ओ. ने कल यही कही है कि कोरोना कभी खत्म होने वाला बीमारी नहीं है। वैक्सीन आ जाने पर, इसे कंट्रोल किया जा सकता है, पर ये समाप्‍त नहीं होगा। उनकी बातों से एक छोटा सा इशारा व्‍यापार के लिये मिलता है। कहा कि जो देश वैक्सीन बना लेता है उसे बडे पैमाने पर उत्पादन भी करना होगा ताकि दुनियाभर के लोगों को वैक्सीन दिया जा सके। मतलब साफ है जो वैक्सीन बनायेंगे उन्हें ही पेटेन्ट मिलेगा। अब देखना यह है कि कौन कितना डोनेशन देता है डब्ल्यूएचओ को। जो अधिक देगा उनका वैक्सीन ही क्लिनिकल ट्रायल में पास होगा। मुझे तो लगाता है इतना बड़ा व्यापार को कौन हाथ से जाने देगा। जरूर अमेरिका या चीन बाजी मार लेगें। डब्ल्यूएचओ ने कोरोना की तुलना एच.आई.वी से की है जबकि मुझे ऐसा नहीं लगता है। कुछ समानता है जो मुझे दिख रही हैंं। एच.आई.वी. से बचने के लिये कंडोम लगाना जरूरी है तो करोना से बचने के लिये मास्क। एक ही मिशन है तो वहॉ और यहां जनसंख्‍या कम करना ही एक मिशन है और उद्देश्य दोनों का एक ही है बहुत बडे पैमाने पर व्यापार करना। उस समय भी एच.आई.वी को कोरोना की तरह बहुत प्रचार किया गया था और रूमाल तक छूने से फैल जायेगा, खूब प्रचार था जबकि वास्तविक कुछ और थी। नोवेल कोराना का वास्तविकता भी, आज नहीं तो कल सबके सामने आ ही जायेगी। एच.आई.वी. के जांच लिये कुछ कंडिशन है। इसी के आधार पर दवाई दी जाती है। जब तक रोगियों को टेस्ट नहीं होता है तब तक व्‍यक्ति, स्वस्थ नजर आता है। टेस्ट पोजेटिव आने पर तब तक इलाज किया जाता है जब तक व्‍यक्ति की मौत न हो जाय। कोरोना के लिये भी, अब दूसरे रणनीति पर काम हो रहा है। एच.आई.वी. की दवाई तो सिर्फ पोजेटिव को ही दी गयी थी जबकि कोरोना की वैक्सीन तो दुनिया भर के लोगों को दी जायेगी जो पोजेटिव है उसे भी और जो निगेटिव है उसे भी। है न कमाल का बिजनेस।

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स्‍वदेशी अपनाओ के साथ, वासुदेव कुटुम्‍बकम् की भावना भी भरी है बच्‍चेे भी।

इधर भारत में, वासुदेव कुटुम्‍बकम् की भावना से रहने वाले लोगों को, सामाजिक दूरियॉ की बात लगातार कही जा रही है, इस बात को मत भूलो। इसी सामाजिक दूरियों को स्‍थापित कराने के लिये, भारत में 20 प्राइवेट कम्‍पनी रेलवे में प्रवेश कर चुकी है। जो लगातार हमारी समााजिक दूरियों को बनाए रखने के लिये, भारत में व्‍यापार करने आ गयी हैं और होना भी चाहिए क्‍योंकि हम सब भारत की धरती पर निवासी हैं जहॉ के शास्‍त्रों में वासुदेव कुटुम्‍बकम् प्रधान बताई गयी है तो हम सबको तो सामाजिक दूरियॉ बनानी आती भी नहीं है और भी नहीं सकती हैं क्‍योंकि भारत की प्रकृति ही ऐसी है। 160 किलोमीटर की गति से, यदि यूरोप में रेल का सफर किया जायेगा तो कफ ठीक रहेगा परन्‍तु यदि भारत में इस गति से सफर किया जायेगा तो वात बढेगा ही। इसको कोई रोक नहीं सकता है क्‍यों‍कि मनुष्‍‍‍य की नहीं देश की भी प्रकृति होती है और भारत एक वात प्रकृति का देश है। नोवेल कोरोना के साथ जिन्‍दा रहना कैसे सीखना होगा? ये ताेे तब पता चलता है जब लॉकडाउन के बाद बदलते हुए, भारत की तस्‍वीर पर एक नजर डालें। तो अधिकारिक सूचना के हिसाब से 5 स्‍टेशन प्राइवेट हो चुके हैं। 27 स्‍टेशन और शायद कतार में खडे हैं। कर्मचारी अब मजदूर घोषित हो गया है और विदेशी मशीने और ज्‍यादा मॅगाकर, विकास केे नये पैमाने जडे जायेगें और जनता को स्‍वेदशी अपनाने को कहा जायेगा। एल.आई.सी. के बारे जनता जानती ही है। एयरपोर्ट के कहने ही क्‍या? आत्‍मनिर्भर भारतीय भूखे पेट तो नहीं रह सकता है। इसके लिये योजनाऐं जो आयी है, उनको ध्‍यान से देेखें या न देखें। जनता से पूछे तो जनता का विश्‍वास अब समाप्‍त हो चुका है। ऑनलाइन शिक्षा व्‍यवस्‍था की तैयारी, तब से चल रही है जब से डिजिटलाइजेशन पर जोर दिया गया था और उसके लिये, बडी से बडी कक्षा के, हल किये गये प्रश्‍न जैसेे गणित के सवाल नेट पर उपलब्‍ध हैं। सामान्‍यता तो गणित समझ में आती नहीं है। अब भला कैसे समझ में आयेगी? इससे भी बढकर सोचना इस बात पर पडता है कि गणित ही नहीं अपितु पूरी शिक्षा व्‍यवस्‍था, भारत की देन है और पढाई पश्चिमी तर्ज जा रही है। टीवी भी अब नेट के माध्‍यम से ही चलेगा, अभी जो बूस्‍टर आपने खरीदा था वो डिब्‍बा हो जायेगा क्‍योंकि उसमें पैसा आपका लगा था कम्‍पनी को काम तो कमाना है उसने कमाया। कहने का अर्थ एक ही है कि सब कुछ ऑनलाइन होगा अभी तक आप जो काम भारतीयता के आधार पर कर लेते थे वो अब ऑनलाइन आकर सबके सामने करना होगा। मन्दिर में पूजा कैसे होगी? क्‍योंकि वो तो सामाजिक दूरियों से नहीं हो सकती है? भारत में हवन कैसे होगा? क्‍योंकि वो भी तो वासुदेव कुटुम्‍बकम् की भावना से पूर्ण होता है। आप कहेगें कि ये सब अन्‍धविश्‍वास है तो राम मन्दिर पर इतनी राजनीति क्‍यों ? उसको भी अन्धविश्‍वास कहो। क्‍या आस्‍था भी पक्षपात बन चुकी है? या हम सब पक्षपाती हो चुकेे हैंं। यह तो सत्‍य है कि आज केे वैज्ञानिक की गलती के कारण, एक वायरस पैदा हो गया जिसने पूरी दुनिया में, महामारी मचा देता है। इस पर, उस देश या संस्‍था या फिर जिसने भी, इस तरह के प्रयोग किये है उससे कुछ नहीं कहा गया और न ही, पूरे विश्‍व में इस बात पर चर्चा हुई कि आगे से ऐसा न हो। इसका उल्‍टा नोवेल कोरोना केे साथ रहना सीखना होगा हमें। उसके लिये कानून में बदलाव किया जा रहा है। इसकी कौन गारंटी देगा कि कल किसी वैज्ञानिक की गलती से, डायनासोर पैदा नहीं होगा। तब क्‍या करोगे? उसके साथ भी रहने की आदत डालने को कहोगे क्‍योंकि विकास की कोई सीमा तो है नहीं। पक्षपाती हों या फिर यूरोप के कहने पर हम चल रहे हैंं, इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ एक कारण है। भारतीय शास्‍त्रों को अवैज्ञानिक बताकर, उस पर भारतीयों का ही कुतर्क करना और अपने शास्‍त्रों से ज्‍यादा हर हिन्‍दुस्‍तानी को दूसरे के शास्‍त्रों के बारे में पता होना। सूर्य की गति से जीने के साथ, अपनी दिनचर्या को नहीं समझना और अपनी रसोई चिकित्‍सा के बारे मेंं, कुछ भी नहीं ज्ञान नहीं रखना। सिर्फ भारतीय शास्‍त्रों में, भोजन को इतना महत्‍व दिया गया है उसको छोडकर आज की स्‍त्री ही बाहर के खाने पर ज्‍यादा भरोसा करती है और साथ ही घर के भोजन के साथ, रसोई को भी बेकार का जगह समझ बैठी हैं जबकि ऋग्‍वेद में वैदिक नारी उसी को कहा गया है जो अपनी से, अपने परिवार को अपनी रसोई से स्‍वस्‍थ रख लेती है। भारत भूमि पर सूर्य देव की कृपा से, कोई भी हिन्‍सावादी, कभी स्‍वस्‍थ नहीं रह सकता है फिर तो कोई भी बडे से बडा वायरस को, भारत में पुरूष की शक्ति कही जाने वाली, भारतीय नारी अपनी रसोई से ही, वैदिक नारी बनकर, उसको परास्‍त कर सकती है।

उपसम्‍पादक सुनील शुक्‍ल

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