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17 साल बाद पूरा हुआ कमाल, विंध्य को चीरकर बनी देश की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग; 1,450 गांवों तक पहुंचेगा नर्मदा जल

SATYAM LIVE (Web Desk) by SATYAM LIVE (Web Desk)
July 17, 2026
in भारत
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17 साल बाद पूरा हुआ कमाल, विंध्य को चीरकर बनी देश की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग; 1,450 गांवों तक पहुंचेगा नर्मदा जल
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मध्य प्रदेश के स्लीमनाबाद पठार पर एक ऐसा ऐतिहासिक और अभूतपूर्व चमत्कार हुआ है, जिसने देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया है. बरगी व्यपवर्तन परियोजना के तहत इंजीनियरों और मजदूरों ने 17 वर्षों के बेहद चुनौतीपूर्ण संघर्ष के बाद विंध्य पर्वत श्रृंखला को चीरकर 11.952 किलोमीटर लंबी और 10.14 मीटर व्यास वाली देश की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग का निर्माण पूरा कर लिया है. मंगलवार दोपहर ठीक साढ़े तीन बजे जब टनल बोरिंग मशीन (TBM) ने आखिरी एक मीटर की चट्टान को तोड़ा, तो 17 साल से चला आ रहा इंतजार खत्म हो गया. यह आधुनिक इंजीनियरिंग की वह ऐतिहासिक कामयाबी है, जिसने सदियों पुरानी उस लोककथा के विरह को हमेशा के लिए सिंचाई के मार्ग में बदल दिया है, जिसमें मैकल पर्वत की दो संतानें—नर्मदा और सोनभद्र—एक पहाड़ के अवरोध के कारण विपरीत दिशाओं में बह चली थीं।

 

सुरंग का आर-पार होना: कितना बड़ा है यह परिवर्तन?

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यह सिर्फ एक सुरंग का पूरा होना नहीं है, बल्कि विंध्य क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खेती और सामाजिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल देने वाला एक ऐतिहासिक परिवर्तन है. इस महापरियोजना के जमीनी प्रभाव और बदलाव की गहराई को इन आंकड़ों से समझा जा सकता है।

 

नर्मदा और सोनभद्र की अधूरी कथा

अब बात को शुरु से शुरु करते हैं..कहा जाता है कि मैकल पर्वत की पुत्री नर्मदा और सोनभद्र का विवाह तय हुआ था. नर्मदा ने सोनभद्र के मन की थाह लेने के लिए अपनी सखी जुहिला को उनके पास भेजा. लेकिन सोनभद्र जुहिला को ही नर्मदा समझ बैठे. यह बात नर्मदा तक पहुंची तो उनका मन टूट गया. वे क्रोध और अपमान में पश्चिम की ओर मुड़ गईं. सोनभद्र उन्हें मनाने निकले, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. वे पूर्व की ओर बह चले. एक अरब सागर तक पहुंची. दूसरा गंगा से जा मिला.लोककथा कहती है कि मैकल की धरती पर शुरू हुई उनकी कहानी कभी पूरी नहीं हो सकी. दोनों एक ही पर्वत की संतान होकर भी विपरीत दिशाओं में बहते रहे. उनके बीच विंध्य की चट्टानें खड़ी रहीं।

 

स्लीमनाबाद का पठार: जब इंसानों ने घेरा पहाड़

इस लोककथा के बाद अब बात आज की स्थित की.सदियां बीत गईं. नर्मदा पश्चिम की ओर बह रही थीं और सोनभद्र पूर्व की ओर. फिर एक दिन कुछ इंजीनियर नक्शे लेकर स्लीमनाबाद के पठार पर पहुंचे. उनके साथ सैकड़ों मजदूर थे. उनके हाथों में फावड़े भर नहीं थे. विशाल टनल बोरिंग मशीनें थीं. सामने करीब 12 किलोमीटर चौड़ा पहाड़ था. उन्हें इसी पहाड़ के भीतर ऐसा रास्ता बनाना था, जिससे नर्मदा का जल विंध्य और सोन के जलग्रहण क्षेत्र की ओर बढ़ सके.यह आधुनिक समय की कहानी थी, लेकिन चुनौती किसी लोकगाथा जैसी थी. एक ओर पहाड़ था. दूसरी ओर पानी की प्रतीक्षा करते खेत।

 

बीच में इंजीनियर और मजदूर थे, जिन्हें नर्मदा के लिए रास्ता बनाना था. इस यात्रा में सबसे कठिन पड़ाव भी यही था नर्मदा और सोन कछार को बांटने वाली विंध्य पर्वत श्रृंखला की रिज लाइन को पार करना,जो ज़मीन से 40 मीटर ऊंची है. यहां ओपन कट या कट एंड कवर पद्धति संभव नहीं थी।

 

क्योंकि इसके लिए 4 करोड़ घनमीटर से अधिक खुदाई, सैकड़ों मीटर चौड़ी कटिंग और उच्च भूजल स्तर जैसी चुनौतियां सामने थीं. लेकिन हर चुनौती पार करते हुए मध्यप्रदेश में देश की सबसे लंबी जल सुरंग बन गई, लंबाई 11.952 किलोमीटर और व्यास 10.14 मीटर. यह विशाल सुरंग नर्मदा के जल को गुरुत्वाकर्षण आधारित प्राकृतिक प्रवाह से बिना किसी पंप की सहायता के आगे ले जाएगी।

 

दायीं तट मुख्य नहर: विंध्य से सीधे टकराव

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दायीं तट मुख्य नहर के 104वें किलोमीटर से 116वें किलोमीटर तक नर्मदा के लिए रास्ता बनाना मानो विंध्य की अग्निपरीक्षा से गुजरना था. पहाड़ ने हर कुछ कदम पर अपना रूप बदला. कहीं मार्बल और लाइमस्टोन की कठोर परतें थीं, कहीं डोलोमाइट की दरारें और स्लेट की पतली चादरें. कहीं रेसिडुअल मिट्टी की नरमी थी तो कहीं घुलते लाइमस्टोन से बनी विशाल कैविटीज़.टनल क्राउन से ऊपर भूजल स्तर, 20 से 33 मीटर का ओवरबर्डन, सिंकहोल का खतरा, एयर लॉस और लिक्विफैक्शन की आशंका लगातार सामने रही. हर 10 से 15 मीटर पर रॉक फेस कंडीशन बदलती रही और 12 से 100 मीटर तक के ट्रांजिशन ज़ोन ने खुदाई को और कठिन बनाया. मलबा गिरा, कठोर चट्टानों ने मशीन रोकी, कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकली और टनल बोरिंग मशीन के कटर हेड बार बार टूटे. मानो सोनभद्र तक पहुंचने से पहले नर्मदा को फिर एक बार विंध्य के हर अवरोध से होकर गुजरना पड़ा।

 

जब पहाड़ को दोनों ओर से काटना शुरू किया

पहाड़ ने एक बार नहीं, कई बार उनकी परीक्षा ली. अपस्ट्रीम हिस्से में लगाई गई अमेरिकी तकनीक की रॉबिन्स टनल बोरिंग मशीन कठिन चट्टानों में बार बार अटक गई. उसके महत्वपूर्ण हिस्से क्षतिग्रस्त हुए. काम रुका. मशीन की मरम्मत हुई. रास्ता फिर खोजा गया.जब लगा कि एक ओर से पहाड़ को हराना संभव नहीं होगा, तो इंजीनियरों ने दूसरी दिशा से लड़ाई शुरू की. डाउनस्ट्रीम हिस्से में जर्मन एचके टनल बोरिंग मशीन उतारी गई. अब पहाड़ को दोनों ओर से काटा जा रहा था.एक दल अपस्ट्रीम से आगे बढ़ रहा था. दूसरा डाउनस्ट्रीम से. दोनों के बीच कई किलोमीटर मोटी चट्टान थी. वे एक दूसरे को देख नहीं सकते थे. केवल नक्शे, गणनाएं और मशीनों के संकेत बताते थे कि दूसरी ओर भी कोई उन्हीं की तरफ बढ़ रहा है।

 

अदृश्य रास्तों को एक बिंदु पर मिलाने का गणित

यह काम केवल चट्टान काटने का नहीं था. दोनों सुरंगों को पहाड़ के भीतर एक ही बिंदु पर मिलना था. करीब 12 किलोमीटर की यात्रा में दिशा का छोटा सा अंतर भी वर्षों की मेहनत को भटका सकता था. इंजीनियर हर दिन ढलान, गहराई और दिशा मापते रहे. टनल अलाइनमेंट मॉनिटरिंग, कोर ड्रिलिंग और आधुनिक सर्वेक्षण तकनीक उनके लिए उस अदृश्य रास्ते का नक्शा बनी रही.मजदूरों के लिए यह नक्शों से अधिक भरोसे की लड़ाई थी. वे मशीन के पीछे खड़े होकर चट्टान हटाते रहे. सुरंग की दीवारों को सहारा देते रहे. पानी निकालते रहे. मशीन के क्षतिग्रस्त हिस्सों को बदलते रहे. पहाड़ जितनी बार रास्ता रोकता, वे उतनी बार लौटकर उसके सामने खड़े हो जाते।

 

17 साल का लंबा अंतराल: सुरंग के मुहाने पर बदल गई जिंदगियां

इसी तरह एक साल नहीं, दो साल नहीं, पूरे 17 साल बीत गए.स्लीमनाबाद के आसपास बच्चे जवान हो गए. जिन मजदूरों ने शुरुआती दिनों में सुरंग के मुहाने पर पहली शिफ्ट की थी, उनमें से कई उम्रदराज हो गए. कुछ साथी इस दिन को देखने के लिए मौजूद नहीं रहे. मशीनें बदलीं. ठेके बदली. अधिकारी बदले. लेकिन पहाड़ के भीतर काम जारी रहा.फिर वह दिन आया जब दोनों ओर से आती सुरंगों के बीच केवल एक मीटर चट्टान बची थी.उस एक मीटर के इस ओर इंजीनियर और मजदूर खड़े थे. दूसरी ओर उनके वे साथी थे, जिन्हें उन्होंने वर्षों से केवल वायरलेस और नक्शों के जरिए जाना था. उनके बीच अब पूरा पहाड़ नहीं, केवल एक आखिरी दीवार थी.मंगलवार दोपहर के ठीक साढ़े तीन बजे टनल बोरिंग मशीन का कटर हेड उस दीवार से टकराया. पत्थर टूटा. धूल का गुबार उठा. सामने से रोशनी की एक रेखा दिखाई दी.6.5 किलोमीटर लंबी अपस्ट्रीम सुरंग स्लीमनाबाद जंक्शन पर 5.4 किलोमीटर लंबी डाउनस्ट्रीम सुरंग से मिल गई. इसके साथ ही 11.95 किलोमीटर लंबी देश की सबसे बड़ी सिंचाई जल सुरंग पहाड़ के आर पार हो गई।

 

इस कथा के असली नायक

इस कथा के नायक किसी राजमहल में नहीं रहते. उनके कपड़ों पर मिट्टी और मशीन का तेल लगा है. उनके हाथों में नक्शे, ड्रिल और औजार हैं. उन्होंने 17 वर्षों तक अंधेरे में काम किया ताकि विंध्य के खेतों तक पानी पहुंच सके.दोपहर साढ़े तीन बजे जब आखिरी चट्टान टूटी, तब केवल दो सुरंगें नहीं मिलीं. एक ओर नर्मदा का जल था. दूसरी ओर सोनभद्र की दिशा में फैली प्यासी धरती. उनके बीच इंजीनियरों और मजदूरों ने अपने श्रम से वह रास्ता बना दिया, जिसे सदियों से विंध्य का पहाड़ रोके खड़ा था।

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