सत्यम् लाइव, 11 अगस्त 2021, दिल्ली।। खुदीराम का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था पिता का नाम बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस तथा माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। बालक खुदीराम के मन में देश को आजाद कराने की ऐसी लगन लगी कि नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आन्दोलन में कूद पड़े। हिन्दुस्तानी पर अंग्रेजी सत्ता द्वारा किये जा रहे अत्याचार को समाप्त करने के लिये संकल्प कर इस बालक ने अंग्रेजी सत्ता के दिल में एक डर सा बिठा दिया था कि भारतीय नवयुवक अपने मातृभूमि के प्रति इतना समर्पित हो सकता हैं।
7 अगस्त 1905 से प्रारम्भ हुए हिन्दु-मुश्लिम के आधार पर लार्ड कर्जन ने जो बंगाल विभाजन किया था। उसके विरोध में खुदीराम रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्यता लेकर वन्दे मातरम् पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगला क्रान्तिकारी सत्येन्द्रनाथ द्वारा लिखे ‘सोनार बांगला’ नामक ज्वलंत पत्रक एक प्रदर्शनी में बाँट रहे थे उस समय एक पुलिस वाले उन्हें पकडने का प्रयास किया परन्तु खुदीराम बोन ने इस सिपाही के मुँह पर घूँसा मारा और दबाकर भाग निकले। राजद्रोह के आरोप में उन पर अभियोग तो चलाया गया परन्तु गवाही न मिलने से खुदीराम निर्दोष साबित हुए।
1905 में लॉर्ड कर्जन के द्वारा जो हिन्दु-मुश्लिम के आधार पर बंगाल का विभाजन किया तब हिन्दु-मुश्लिम एक साथ मिलकर सड़क पर विरोध प्रदर्शन करते थे तो कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड उन सभी हिन्दु-मश्लिम को क्रूर दण्ड देता था। साथ ही क्रान्तिकारियों को बहुत कष्ट दिया करता था। ऐसा करने वालों को पदोन्नति देना ये अंग्रेजी सत्ता का नियम था इस कारण से किंग्जफोर्ड को पदोन्नति करके मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के बना दिया गया। ‘‘युगान्तर’’ समिति की एक गुप्त बैठक में किंग्जफोर्ड को ही मारने की योजना बना डाली। खुदीराम को एक बम और पिस्तौल तथा प्रफुल्लकुमार ने एक पिस्तौल ली। मुजफ्फरपुर पहुॅचकर किंग्जफोर्ड के बँगले की निगरानी प्रारम्भ की। बग्घी तथा घोडे का रंग देख तथा किंग्जफोर्ड के कार्यालय का भी निरिक्षण किया।
अब किंग्जफोर्ड को मारने के लिये रात्रि का समय तय कर लिया। अँधेरा हो चला था खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार बग्घी के आने का इन्तजार कर रहे थे। बग्घी आते ही निशाना लगाकर से बम फेंका दिया। परन्तु दैवयोग ही था कि वो गाड़ी पर दो यूरोपियन स्त्रियॉ थीं जिन्हें अपने प्राण गंवाने पड़े। खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार दोनों ही भाग कर 24 मील दूर स्थित वैनी रेलवे स्टेशन पर जाकर ही विश्राम किया परन्तु पुलिस उनके पीछे पड़ चुकी थी।
दूसरे दिन ही प्रफुल्लकुमार चाकी को पुलिस ने घेर लिया उन्होंने स्वयं पर गोली चलाकर अपने प्राणार्पण कर लिया। खुदीराम को पुलिस ने पकड़े गये। 11 अगस्त 1908 को भगवद्गीता हाथ में लेकर खुदीराम बोस खुशी-खुशी फाँसी चढ़ गये। इस वीर बालक को हॅसते हुए फाँसी पर जाने की खबर सुनकर किंग्जफोर्ड ने घबराकर नौकरी छोड दी। मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी दिलाई थी उसने लिखा कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख्ते की ओर बढ़ रहा था। मात्र 18 वर्ष कुछ माह की आयु में इस शहादत को लोकप्रिय तब हुई जब भारत के समस्त नवयुवक उनके नाम की एक खास किस्म की धोती पहनने लगे। क्रान्तिवीर खुदीराम बोस का स्मारक बनाने की योजना कानपुर के युवकों ने बनाई और उनके पीछे असंख्य युवक इस स्वतन्त्रता.यज्ञ में आत्मार्पण करने के लिये आगे आने लगे अब अनेक क्रान्तिकारियों के त्याग की कोई सीमा न रही।
सुनील शुक्ल





















