सत्यम् लाइव, 1 अगस्त, उत्तर प्रदेश।। भारत वर्ष में गौ माँ कि रक्षा की बात की जाये तो लोग अपने प्राण तक न्यौछावर कर देते है और कर भी क्यों न दें। इस देव भूमि में सदा से, देवों की प्रिय गौ माँ, हमारे ऋषियों और मुनियों के साथ रही है। श्री कृष्ण भगवान की अतिप्रिय है ये गौ माँ भारत की अर्थव्यस्था का आधार बिन्दु आज भी है। इसकी रक्षा के लिए क्रांतिकारियों ने अपना रक्त तक बहाया जिसमें क्रांतिकारी मंगल पाण्डे का अंग्रेजो के प्रति विद्रोह याद ही है हम सबको। साथ ही स्वामी दयानंद सरस्वती जी के नेतृत्व में, 1894 तक हिन्दु-मुस्लिम साथ मिलकर गौरक्षा के लिये खड़े थे।
अंग्रेजों से स्वतंत्रता के पश्चात् भी इंदिरा जी के कार्यकाल में, गौरक्षा के लिए संतो ने, संसद भवन का घिराव किया और सैकड़ो संतो ने प्राणों का बलिदान दिया। इतनी आस्था गौ माता के प्रति, भारत में मिलना, साधारणतयः नहीं अपितु हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। ऐसी ही आस्था लव-कुश की नगरी कानपुर में, आज भी जीवित है। उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के शिवली क्षेत्र के अन्दर में स्थित श्री राघव गौवर्धन गौशाला समिति जहाँ बेसहारा गायों की देख-रेख की जा रही है। इस गौशाला के संचालक श्री राघव शुक्ल हैं जिन्हें हाल ही में ‘इंडियन बुक ऑफ रिकार्ड‘ तथा ‘इंटरनेशल बुक ऑफ रिकार्ड‘ द्वारा सम्मानित किया गया है।
कारण बना कम उम्र के गौ सेवा में लग जाना। राघव शुक्ल के एनजीओ को श्री राघव गोवर्धन गौशाला समिति के माध्यम से गाय पुनर्वास के लिए अनुकरणीय कार्य करने के लिए बारम्बार सराहा जा रहा है। गायों की दैनिक जरूरतों का ख्याल रखते हुए इस गौशाला को और विकसित करने का प्रयास जारी है। साथ ही इस समिति में शामिल श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता (लोकतंत्र सेनानी), श्री धर्म नाराण शुक्ला, श्री अशोक खुमानी, श्री संतोष खण्डेलवाल, श्री आकाश दास, श्री आकाश शुक्ला, श्री प्यारे लाल आदि से बात करने पर उन्होंने हमें जानकारी दी कि आगे हम जैविक खाद्य से लेकर और अन्य प्रोडेक्ट का उत्पादन प्रारम्भ किया है।
श्री राघव गौवर्धन गौशाला समिति के मुख्य प्रवक्ता श्री सुनील शुक्ल के अनुसार गौरक्षा के लिये गौमाता का पुनः भारतीय अर्थव्यवस्था में शमिल करने के हम सब प्रयासरत हैं। साथ ही शिक्षा व्यवस्था में पुनः वैदिकता आधार देने का प्रयास भी लगातार जारी कर रखा है। हम समाज के लिए वो शिक्षा पुनः जाग्रत करने वाले हैं जो हमारे समाज से लुप्त हो चुकी है। ये विद्या हमारे ऋषि-मुनियों ने हमारे समाज के लिए बनाई थी। हम बात कर रहे वैदिक गणित की जो यह भारत की रसोई से शुरू होती। ये चिकित्सा का वो क्षेत्र है जो स्वतंत्र रूप से सभी को ज्ञान दिया जाना चाहिए। इसी कारण से भारतीय नारी को वैदिक नारी कहा गया था। जो पश्चिमी विकास की धुंध में कहीं विलुप्त हो गया है। अब वो समय आ गया है जब फिर से समाज को भारतीय शिक्षा व्यवस्था से अवगत कराकर। भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थापना कराई जाये। बहुत जल्द ही अन्य स्थलों पर भी इस कार्य का श्रीगणेश करेगें। अभी दिल्ली में ‘‘वैदिक शिक्षा केंद्र’’ के नाम से जिसमें हमने बालक बालिकाओं भारतीय संस्कृति और सभ्यता से वैदिक गणित के आधार पर परिचय कराया जा रहा है।
मंसूर आलम





















