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जलवायु परिवर्तन का कारण उपभोगवादी विज्ञान

सत्यम् लाइव, 21 अगस्त, 2021 दिल्ली।। जलवायु परिवर्तन की बात लगातार बताई जा रही है। साथ ही विज्ञान के विकास की बात पर गर्व भी किया जा रहा है। वैदिक गणित के अनुसार विज्ञान को दो भागों में बॉटा हुआ है ऐसा कहा जा सकता है। वैदिक गणित के अनुसार जिस विज्ञान का जन्म होगा उसे अध्यात्म विज्ञान का ही नाम दिया जायेगा। जबकि पश्चिमी विज्ञान जो आज मशीन की सत्यापित पर आधारित है उसे उपभोगवादी विज्ञान ही कहा जायेगा। इस उपभोगवादी विज्ञान जिसने आज बहुत विकास किया है। उसी के कारण जलवायु परिवर्तन की बात कही जा रही है क्योंकि जलवायु के विरोध में जाकर जब कोई भी मशीन काम करना चाहेगी तो उससे वो गैसें निकलेगीं जो प्रकृति को नुकसान पहुँचायें। तुलसीदास जी के अनुसार कलयुग में सदैव ही ऐसा होता है। वैदिक गणित के अनुसार कलयुगी कितने गुजरे हैं ये प्रश्न खड़ा होता है? और संस्कार अर्थात् गणना करने पर इसका उत्तर निकाला जा सकता है परन्तु इस वैदिक गणित को अन्धविश्वास की श्रेणी में मैकाले एण्ड कम्पनी ने रखा था जो आज भी बना हुआ है।

जलवायु परिवर्तन करते हुए आज हम किस स्थिति में हैं इस पर एक नजर और स्वयं को दोषी मानना बहुत आवश्यक है क्योंकि इस जलवायु परिवर्तन में आधुनिक अर्थात् उपभोगवादी विज्ञान से प्राप्त हर ऐशोआराम की वस्तु को हम सबने भी विकास मानकर, अपनाया हुआ है। उसमें फ्रिज, एसी से लेकर गाड़ी की सुविधाऐें भी हैं। इन सबसे निकलती हुई गैसों ने जो जलवायु परितर्वन किया है उस पर एक नजर डालते हैं।

एक तरफ विश्व का पश्चिम भाग है जहॉ पर जलवायु परिवर्तन का सीधा असर दिखाई दे रहा है और भयंकर जल संकट के कारण सूखा बना हुआ है। ये जल संकट अमेरिका में तापमान रिकार्ड तोड़ बढ़ने के कारण हुआ है और अमेरिका ये स्वीकार भी कर रहा है जब लेक मीड जलाशय में पानी दस फुट की कमी आयी है और उपभोगवादी विज्ञान के कारण ही एरिजोना में करीब 18 प्रतिशत, नवादा में करीब 7 प्रतिशत और मैक्सिको में 5 प्रतिशत की कमी आयी है। गृह मंत्रालय के सहायक सचित तान्या त्रुजिलो ने जल संकट का कारण जलवायु परिवर्तन बताते हुए कहा कि ये जलवायु परिवर्तन के कारण धरती आगे भी गर्म रहेगी और जल संकट आगे भी आयेगा। इस संकट में पश्चिमी भाग का लगभग 63 प्रतिशत पानी सूख चुका है। इतिहास का सबसे बड़ा सूखा बताते हुए गवर्नरों ने राष्ट्रपति बाइडन विशेष मदद मुहैया करने की अपील की है। इस जल संकट से लगभग 6 करोड़ लोग प्रभावित हैं।

इस जलवायु परिवर्तन का दूसरा दृश्य भारत का देखते और समझते हैं जो हम सबसे कहीं छूपा नहीं है परन्तु अपनो की परेशानी हमें दिखना अब बन्द हो गयी है क्योंकि मीडिया वही दिखाता है जिससे उसका अपना फायदा होगा। भारत देश के कई राज्य जल संकट में बाढ़ के कारण परेशान हैं। भारत में ये जल संकट का कारण अति वर्षा है। अमेरिका में यदि पशु-पक्षी या मानव पानी न होने कारण खाने का संकट है तो भारत के बहुत बड़े क्षेत्र में इतना पानी है कि भोजन बनाने की समस्या बनी हुई। बिहार से कुछ खबरें आती हैं कि भूख के कारण बच्चें रोते-रोते सो जाते हैं। उप्र में बाढ़ की समस्या के कारण लोगों को खाना बनाने की समस्या खड़ी है। सभी क्षेत्र में लोग सत्तू से अपना पेट भर रहे हैं। अपने घरों की छतों पर कई दिनों से लोग रह रहे हैं। पशुओं के लिये भी चारे का संकट बना हुआ है। लोगों ने अपना घर खुला छोड़कर ही पलायन कर रहे हैं।

अमेरिका में पानी न होने के कारण अगर फसल नहीं हो पायी है तो भारत में पानी अधिक होने के कारण फसल चौपट हो चुकी है। जीवन के लिये ये प्राकृति से संघर्ष करना कितना भयावह होता है ये वहीं समझ सकता है जो इस संकट से जूझ रहा हो आज भी देश के उस भाग में जहॉ संकट नहीं है। जैसे दिल्ली के लोगों को इस संकट का एहसास नहीं है बल्कि उन्हें जातिवाद के चक्र ने अभी भी घेर रखा है वैसे इसका मुख्य कारण ही उपभोगवादी विज्ञान है क्योंकि सोचने की शक्ति स्वयं तक सीमित हो गयी है। दूसरे का संकट अब संकट नहीं दिखता है, दिखता मात्र उतना ही है जितना उपभोगवादी विज्ञान डिजिटल के माध्यम से जितना आपको समझाता है। शेष समझने के लिये समय भी नहीं है। आज के व्यक्तियों के पास।

सुनील शुक्ल


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