सत्यम् लाइव, 9 सितम्बर 2020, दिल्ली।। अष्ठदशा भुजाधारी की महिमा का वर्णन जो मिलता है वो बताता है कि माता ने समस्त उन राक्षसों को समाप्त किया जो किसी भी देवता से नहीं समाप्त हो रहे थे। आज उन्हीं माता के पूजन काल मेेंं कोरोना नामक वायरस प्रवेश करता है वो भी चैत्र मास में, जब उत्तरायण काल है अगस्त तारा उदय है। अगस्त ऋषि के लिये कहते हैं समुद्ध के अन्दर छुपे हुए राक्षसों को खोजकर मार डाला था। श्रीराम की महिमा का वर्णन तो आप सभी जानते हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने जो मैकाले केे लिये समाने शिक्षा व्यवस्था मेें अपना प्रस्ताव रखा था उसमें आयुर्वेद के साथ, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, शतपथ ग्रन्थ और सूर्य सिद्धान्त पढाने को कहा था। आयुर्वेद केे अध्ययन के पश्चात् सूर्य सिद्धान्त को पढने का अवसर मिला। तब पता चला कि सूर्य के माध्यम से ही गणित का जन्म है और गणित ही है जिसे काल के हिसाब से मनुष्य ने बनाया। आयुर्वेद में भी काल का बहुत महत्व है। भारतीय शास्त्रों को जाने बिना, श्रीराम के डोगी भक्तों ने संक्रमण काल को एक नया नाम दे डाला वो था कोरोना काल। विक्रम सम्वत् २०७७ में भारत की केन्द्र सरकार सहित समस्त प्रदेश की सरकार ने प्रोटोकॉल का पालन करते हुए भारतीय शास्त्रों को गलत साबित करनेे का जाने अनजाने में कार्य कर डाला है। इन सरकारों में कई ऐसे मंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री भी शामिल हैं जो स्वयं को हिन्दुवादी कहते हैं ये अलग बात है कि उन्हें हिन्दु के शास्त्रों केे बारे में कोई भी ज्ञान नहीं है। महान गण्तिज्ञ आर्यभट्ट जी द्वारा रचित ग्रन्थ सूर्य सिद्धान्त और आयुर्वेद को जब आपस में मिलाकार समझा तो ये सिद्ध हुआ कि भारत की धरती पर कोई भी वायरस को आने से पहले सूर्य की गति से निपटना पडता है और अरबों साल से सूर्य की तेजी से भारत की धरा पर कोई भी वायरस जीवित नहीं रह पाता है इसके पश्चात् यदि जीवित रह भी जाता है तो बहुत समय तक जीवित रह ही नहीं सकता है उसकी अवधि महर्षि राजीव दीक्षित ने जो स्वयं आज के ही वैज्ञानिक भी थे 27 दिन बताई है। इसके पश्चात् भी उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ सरकार ने कोरोना काल में, प्रोटोकॉल के साथ दुर्गा पूजा पंडाल अब खुले में धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं, बशर्ते उन्हें कोविड के सभी दिशा-निर्देश का पालन करना होगा, जैसे सामाजिक दूरियों का पालन करना, मास्क पहनना ओर साथ में कलयुगी गंगाजल सैनेटाइजर का प्रयोग अनिवार्य होगा। झारखंड की औद्योगिक नगरी जमशेदपुर में दुर्गा पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है लेकिन वहां प्रशासन के इस आदेश के बाद मूर्ति बनाने वाले कलाकार बेहद परेशना हो गए हैं। मूर्ति बनाने वाले कलाकारों के मुताबिक हर साल 8 फीट से लेकर 15 फीट तक की मूर्ति बनती थी और इनकी कीमत 15 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक होती थी। हालांकि जमशेदपुर में सरकार के आदेश के बाद जो इस बार मूर्तियां बनाई जा रही हैं वो सभी सिर्फ चार फीट की ही हैं और इनकी कीमत 4 हजार से लेकर 15 हजार रुपये तक होगी। कलाकारों को इससे आर्थिक नुकसान होने का डर सता रहा है। सरकार के फैसले से अब मूर्ति कलाकार काफी परेशान हैं लेकिन वो नियम को मानने के लिए भी बाध्य हैं। यही वजह है कि इस बार हर मूर्ति कारीगर सिर्फ चार फीट की ही प्रतिमा बना रहा है। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलार को दुर्गा पूजा केे दौरान दिशा-निर्देशों के पालन करने को कहा है। कलकत्ता की दुर्गापूजा का महत्व बहुत है। उन्होंने कहा, ‘मैं एक बार फिर पूजा समितियों और लोगों से कोविड-19 सुरक्षा नियमों का पालन करने में पुलिस तथा प्रशासन के साथ सहयोग करने की अपील करती हूं। पंडाल में जाने से पहले सभी मास्क पहने और सैनिटाइजर (कलयुगी गंगाजल) का इस्तेमाल करें। दुर्गा पूजा खुले स्थानों पर ही पंडाल लगाए जायेगें।’ बिहार पर एक नजर डाल लेते हैं यहॉ पर कलश स्थापना की अनुमति दी है, मूर्तिकारों ने कुछ ही मूर्तियां बनाकर काम बंद कर दिया है कारण सभी प्रदेशों मेंं डर है कि कहीं ऐसा न हो कि सारी मूर्तियॉ रखी रह जायें और अपने ही वादे से बदल जाये। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है बल्कि समस्त प्रदेशों सहित झारखण्ड और बिहार के लोगो की मनोदशा बन चुकी है ये। पूरे भारत सहित यहॉ के मूर्तिकार भी बेरोजगारी की दशा को झेल रहे हैं। पहले ही रोटी नसीब नहीं हो रही थी अब तो आगे कभी भी भारतीय हाथ के दस्तकार कहीं मिल जायेगा ये हर बुद्धिजीवि को संदेह है। आज दशा ये है कि सभी हाथ केे दस्तकार अपनी रोटी के लिये कुछ नया करने को सोच रहे हैं और इसमें कोई भी संदेह नहीं है कि भारतीय रीजि-रिवाज में, इतने बडे स्तर पर विदेशी कम्पनी का आगमन हुआ है। भारत का हर किसान कर्जो पर लदा हुआ है वो कर्ज कैसे उतारेगा ये ज्ञात नहीं है? ये मजदूर वर्ग ही आज का किसान है जो कहीं से भी अपनी मेहनत से रोटी खा लेना चाहता है परन्तुु ये निर्मम लोग अथाह पैसों के लालच में आकर पूरे समाज को अवैज्ञानिकता की राह पर ले जाकर ये सिद्ध करने में लगे हैं कि भगवान के नाम पर वोट लिया जा सकता है परन्तु भगवान की पूजा करने का सिद्धान्त जो भारतीय शास्त्रों मेंं दिया है वो सब गलत है।
सुनील शुक्ल





















