सत्यम् लाइव, 6 अगस्त 2021, दिल्ली।। भारतीय समाज में लगातार बढ़ते हुए कुछ तथ्यहीन केसों का जिम्मेदार कौन है जब लखनऊ गर्ल्स ने खुलेआम सड़क पर एक कैब ड्राइवर की पिटाई करते हुए नजर आ रही है तब मीडिया में उससे खुलेआत प्रश्न किये गये कि इससे पहले भी आपने ऐसे ही वाक्या होता रहा है तब उसने उस कैब ड्राइवर के गैंग के लोगों ने उसे 300 मीटर तक दौड़ाया जैसी बात बताई परन्तु लगातार छानबीन होती रही तो अब उस लड़की की अपने पड़ोसी से उलझने की रिकार्डिग सामने आयी है जिसमें खुलेआम वो दीवार पर किये गये काले रंग को लेकर उलझ रही है और पुलिस वाले उसे समझ रहे हैं कि ये गलत कह रही है परन्तु कर क्या सकते हैं।
अगर इस काण्ड में कैब ड्राइवर ने जो रिपोर्ट लिखाई है कि उसका मोबाईल तोड़ा और 600 रूपये उससे छीने। पर गौर करें तो इस तरह के केस लगातार आ रहे हैं कुछ दिनों पहले एक वीडियो रिकार्डिग सामने आयी। जिसमें एक लड़की कान की लीड खरीदते हुए, दुकनदार से लड़ती है कि 500 रूपये दिये हैं बाकी पैसे वापस करो परन्तु जब कैमरे में देखा जाता है तो पता चलता है कि एक भी रूपया नहीं दिया है। जब वो वीडियो चलाया जाने लगता है तब वो लड़की वहॉ से चली जाती है। सब उससे कहते भी हैं कि पैसे लेते जाओ परन्तु वो रूकती नहीं है।
ऐसे केस लगातार बढ़ रहे हैं मुख्य कारण पर नजर डालें तो भारत में, महिला को वैदिक नारी का तबका समाप्त करके, आज नारी सशक्तिकरण की तरफ ले जाता हुआ समाज में, पश्चिमी करण का ये जो नया भेष धारण किया है उसमें अपरिग्रह का कहीं भी विचार नहीं है। एसी लगाकर या कार दौड़ाकर जो प्रदूषण फैलाये उसे विकास कर रहा है कहते हैं और यदि कोई लड़का या लड़की साईकिल से चले, साधारण जीवन यापन करे। कम पैसों में अपना जीवन काटे तो उसे अविकासशील माना जाता है और ये हमारे समाज में आज की शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से, टीवी से, मोबाईल से सरकार स्वयं विकास की रट लगाती हुई नजर आ रही है वो समाज में साफ दिखाई दे रहा है।
आज खुलेआम कुछ लड़के-लड़कियॉ ऐसे कार्य कर रही हैं वो मीडिया या पुलिस से छुपा नहीं है। उन बच्चों के माँ-बाप और शिक्षक को भी पता है कि ये गलत हो रहा है परन्तु मूकदर्शक बनकर देखने के सिवा कोई कुछ भी नहीं कर पा रहा है कारण है। पश्चिमी सभ्यता से आयी हुई सोच जो अंग्रेजों ने फैलाई आज फल-फूल रही है। समाज में लगातार पैसा कमाने का बढ़ता हुए चलन को सफलता मानने को भारतीय शास्त्र कहीं भी नहीं कहते परन्तु पश्चिम सभ्यता में सफल वही है जो अथाह सम्पत्ति का मालिक हो। भारतीय शास्त्रों में पुत्र धन है जबकि पुत्री रत्न और पशु धन-सम्पदा।
पश्चिमीकरण के बढ़ते कदम ने भारतीय सोच सहित भारतीय शास्त्र को गलत साबित कर दिया है। अपरिग्रह को भूले समाज जो माँ-बाप, गुरू की इज्जत है वो किसी से छुपी नहीं है परन्तु अब ये बाहर बहुत दिन चल नहीं पायेगा और अब ये हर घर-परिवार में होगा। सास के दिन सबसे ज्यादा खराब आने वाले हैं? इसके साथ ही सास और ससुर को मेरी तरफ से सुझाव हैं कि बृद्धाश्रम में अपने लिये जगह अभी से बना लो क्योंकि ये खेल बाहर सड़कों पर, बहुत दिनों तक नहीं चलेगा। ये घर-परिवार में एक चलन के रूप में परिवर्तित होगा और ये जल्द होगा।
सुनील शुक्ल





















