साक्षात्कार एवं प्रस्तुति: दीक्षा वाणी
नई दिल्ली। प्रतिभा किसी उम्र, परिस्थिति या संसाधन की मोहताज नहीं होती। यदि प्रतिभा के साथ निरंतर मेहनत, सीखने की इच्छा और दृढ़ संकल्प जुड़ जाए, तो साधारण परिस्थितियों से निकलकर भी असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। संगीत साधक गुरु शितांशु चौधरी की जीवन-यात्रा इसी विश्वास को मजबूती देती है।
21 वर्ष की उम्र में जीवनयापन के लिए जूतों की एक साधारण दुकान पर काम करने वाले शितांशु चौधरी ने आगे चलकर संगीत को अपना जीवन समर्पित किया। सात सुरों की साधना से शुरू हुआ उनका सफर देश के विभिन्न मंचों से होते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। उन्होंने भारतीय संगीत और संस्कृति को दुनिया के कई देशों में प्रस्तुत किया और अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ मंच साझा किया।
अखबार में छपे एक विज्ञापन ने बदल दी जिंदगी
गुरु शितांशु चौधरी के जीवन में निर्णायक मोड़ उस समय आया, जब 21 वर्ष की उम्र में जूतों की दुकान पर काम करते हुए उनकी नजर अखबार में प्रकाशित एक विज्ञापन पर पड़ी। विज्ञापन में फोक डांस असेंबली (Folk Dance Assembly) के लिए कलाकारों की भर्ती की जानकारी दी गई थी।
उन्होंने ऑडिशन दिया और उनका चयन हो गया। यही अवसर उनके जीवन में नए अध्याय की शुरुआत बना। इसके बाद उनका जुड़ाव कला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से बढ़ता गया और संगीत की दुनिया में आगे बढ़ने का रास्ता खुला।
बताया जाता है कि फोक डांस असेंबली से जुड़े संस्थागत बदलावों के दौरान, तत्कालीन परिस्थितियों में सांग एंड ड्रामा डिवीजन (Song and Drama Division) के संस्थापक कर्नल हेमचंद गुप्ता और प्रसिद्ध रंगकर्मी ज़ोहरा सहगल के प्रयासों से फोक डांस असेंबली को सांग एंड ड्रामा डिवीजन में शामिल किया गया। इससे कलाकारों को एक संस्थागत मंच और आगे बढ़ने का अवसर मिला।
23 वर्ष की उम्र में शुरू हुई सात सुरों की कठिन साधना
गुरु शितांशु चौधरी की संगीत यात्रा की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने अपेक्षाकृत देर से संगीत की औपचारिक साधना शुरू की।
23 वर्ष की उम्र तक उन्हें संगीत के सात सुरों का भी बुनियादी ज्ञान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने इस चुनौती को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने सुर, ताल और संगीत की बारीकियों को सीखने के लिए लगातार अभ्यास किया।
उनके अनुसार, संगीत सीखने की कोई निश्चित उम्र नहीं होती। लगन और नियमित साधना के बल पर उन्होंने कम समय में संगीत की ऐसी समझ विकसित की, जिसके लिए सामान्यतः कई वर्षों की कठिन तालीम की आवश्यकता होती है।
दिग्गज संगीत गुरुओं से मिला मार्गदर्शन
संगीत साधना के दौरान गुरु शितांशु चौधरी को कई प्रतिष्ठित संगीत आचार्यों का मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त हुआ। इनमें उस्ताद निसार हुसैन खान, पंडित भगवती सिंह शीतल और प्रणव चौधरी जैसे नाम शामिल हैं।
इन गुरुओं से प्राप्त शिक्षा ने उनकी संगीत साधना को नई दिशा दी और उन्हें भारतीय संगीत की बारीकियों को गहराई से समझने का अवसर मिला।
जटिल संगीत तकनीकों को आसान बनाने का प्रयास
लंबी संगीत साधना और अनुभव के बाद गुरु शितांशु चौधरी ने संगीत सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाने की दिशा में भी काम किया।
उन्होंने 12 सुरों पर पकड़ बनाने के साथ-साथ होंठ, जीभ, कंठ, सांस, खटका, मुड़की, मींड और सपाट तान जैसी तकनीकों को अभ्यास आधारित सरल तरीकों में समझाने का प्रयास किया।
उनकी यह पद्धति शुरुआती विद्यार्थियों के लिए उपयोगी मानी जाती है, क्योंकि जटिल संगीत तकनीकों को छोटे-छोटे अभ्यासों के माध्यम से समझने और आत्मसात करने पर जोर दिया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय संगीत की प्रस्तुति
संगीत की अपनी साधना और अनुभव को आगे बढ़ाते हुए गुरु शितांशु चौधरी ने देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी प्रस्तुतियां दीं।
उनकी संगीत यात्रा में उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पंडित बिरजू महाराज और पंडित विनय चंद मुद्गल जैसी प्रतिष्ठित हस्तियों के साथ संगत और प्रस्तुतियों का उल्लेख मिलता है।
दुनिया के विभिन्न देशों में भारतीय संगीत और संस्कृति की प्रस्तुतियों के माध्यम से उन्होंने भारतीय कला परंपरा को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने में योगदान दिया।
तीन दशकों की संगीत साधना और अनेक शिष्य
लगभग तीन दशक की संगीत यात्रा के दौरान गुरु शितांशु चौधरी ने अनेक विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दी। उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले कई शिष्य आगे चलकर संगीत के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने में सफल हुए।
उनकी भूमिका केवल कलाकार तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने गुरु के रूप में संगीत की अगली पीढ़ी तैयार करने पर भी जोर दिया।
भारत सरकार के सांग एंड ड्रामा डिवीजन से सेवानिवृत्त
गुरु शितांशु चौधरी भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन सांग एंड ड्रामा डिवीजन में असिस्टेंट म्यूजिक कंपोजर (Assistant Music Composer) के पद पर कार्यरत रहे और वहीं से सेवानिवृत्त हुए।
सरकारी सांस्कृतिक संस्थान से जुड़े रहते हुए उन्होंने संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के क्षेत्र में लंबे समय तक योगदान दिया।
75 वर्ष की उम्र में भी सीखने की ललक
आज 75 वर्ष की उम्र में भी गुरु शितांशु चौधरी संगीत के प्रति उसी समर्पण और जिज्ञासा के साथ जुड़े हुए हैं। उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने उम्र को कभी सीखने के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।
जूतों की दुकान पर काम करने वाले एक युवा से लेकर भारतीय संगीत के साधक, शिक्षक और अंतरराष्ट्रीय मंचों के कलाकार बनने तक की उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि शुरुआत करने के लिए कभी देर नहीं होती।
उनका जीवन संघर्ष से साधना, साधना से उपलब्धि और उपलब्धि से अगली पीढ़ी को ज्ञान देने की यात्रा है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
गुरु शितांशु चौधरी की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो परिस्थितियों, उम्र या संसाधनों की कमी को अपने सपनों की राह में बाधा मानते हैं।
उनकी यात्रा बताती है कि किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए निरंतर सीखने की इच्छा, अनुशासन, अभ्यास और धैर्य सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। संगीत के प्रति उनका समर्पण और विद्यार्थियों को सिखाने की उनकी प्रतिबद्धता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है।
जूतों की दुकान से शुरू हुआ यह सफर दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचा और आज भी जारी है—यही गुरु शितांशु चौधरी की जीवन-यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता है।
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