सत्यम् लाइव, 21 जून 2021, दिल्ली।। वैदिक गणित के अनुसार योग एक व्यापक रूप है सौर मण्डल में पाॅच तत्व में एक तत्व योग है यही योग अध्यात्म विज्ञान से होता हुआ वनस्पति में योग करता है। यही योग मानव जीवन में कई रूपों में पाया जाता है। भगवान कृष्ण के अनुसार मानव जीवन में योग दिनचर्या है इस दिनचर्या का का छोटा सा रूप महर्षि राजीव दीक्षित ने 2007 में पुनः सबको बताया है। योग काल में विकला है।
योग मानव जीवन में एक शुद्ध दिनचर्या है, यही योग ऋतुचर्पा के अनुसार वैदिक गणित का रूप धारण कर विज्ञान के रूप में बदल जाता है और ये सर्वप्रथम अध्यात्म विज्ञान के रूप में बदलता है जो पुनः एक विकराल रूप रखकर कर योग कहलाता है। योग के लिये अर्जुन नेे भगवान कृष्ण से गीता में पूछा था कि योग क्या है? तब भगवान कृष्ण ने कहा कि ‘‘युक्ताहार विहारस्य, युक्ताचेष्ठय कर्मसु। युक्तास्वप्ना विभूदस्य योगों भवति दुखह्।।युक्ताहार विहारस्य, युक्ताचेष्ठय कर्मसु। युक्तास्वप्ना विभूदस्य योगों भवति दुखह्।।’’ अर्थात् यदि किसी व्यकित के उठने-बैठने, चलने-फिरने, खाने-पीने, सोने-चाहने का नियम उचित नहीं है तो यही योग उसको दुख देने वाला है।
पूजा में ही प्राणायाम में भस्त्रीका लगभग 5 मिनट, और अनुलोम विलोम 10 से 15 मिनट अवश्य करें और ध्यान के माध्यम से श्वाॅस को नियंत्रित करें। मन को एकाग्र करके बताये कि आपके इष्टदेव आपके साथ है और कोई भी वायरस आपको छू नहीं सकता है। ध्यान के माध्यम से मन आस्था जगाई जाती है यही आस्था विश्वास बनकर आपको विपदा के समय बचने का उपाय याद कराती है अतः अपना विश्वास अवश्य जगायें। जो पूजा न कर सके वो कम से कम 15 मिनट ताड़ासन, सूर्य नमस्कार अवश्य करे। इससे उसके फेफड़े मजबूत होगें और जो पसीना निकलेगा उससे शरीर में प्रवेश करने वाले कीटाणु अर्थात् वायरस स्वतः की मर जायेगें। पानी सदैव ही गर्म करके ही पियें।
सुनील शुक्ल





















