वर्ष 2004 में देशद्रोह, जासूसी और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट जैसी गंभीर धाराओं में दर्ज बहुचर्चित मामला करीब 22 साल बाद अदालत में समाप्त हो गया। एडीजे-8 रविकांत-द्वितीय की अदालत ने मुख्य आरोपी जमील अहमद को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।
यह मामला वर्ष 2004 में सामने आया था और इसकी जांच कथित तौर पर पाकिस्तानी नागरिकों की गिरफ्तारी से शुरू हुई थी। अभियोजन की कहानी में एक गोपनीय सीडी को अहम साक्ष्य बताया गया था, लेकिन सुनवाई के दौरान इस साक्ष्य की स्थिति पर गंभीर सवाल सामने आए।
दो पाकिस्तानी नागरिकों की गिरफ्तारी से शुरू हुआ मामला
घटना 5 जनवरी 2004 की बताई गई है। थाना सदर पुलिस ने लालकुर्ती मोड़ के पास संदिग्ध परिस्थितियों में दो पाकिस्तानी नागरिकों समीर उर्फ मुईन उद्दीन और शेर अली को गिरफ्तार करने का दावा किया था।
पुलिस के अनुसार, दोनों के पास से सेना के छावनी क्षेत्रों से संबंधित नक्शे और कथित गोपनीय दस्तावेज बरामद किए गए थे। पूछताछ के बाद जांच की दिशा झांसी शहर कोतवाली क्षेत्र के तलैय्या निवासी जमील अहमद तक पहुंची।
घर से गोपनीय ट्रेनिंग सीडी मिलने का था दावा
पुलिस ने दावा किया था कि 12 जनवरी 2004 को जमील अहमद के घर की तलाशी के दौरान एक सीडी बरामद हुई। अभियोजन के मुताबिक, इस सीडी में इंसास राइफल चलाने से संबंधित गोपनीय ट्रेनिंग डेमोंस्ट्रेशन मौजूद था।
यही सीडी आगे चलकर मामले के प्रमुख साक्ष्यों में शामिल हुई और अभियोजन की कहानी में इसे महत्वपूर्ण आधार माना गया।
अदालत में सीडी के कई टुकड़े मिले
मामले की सुनवाई के दौरान जब अदालत के सामने सीलबंद सीडी को खोला गया तो वह कई टुकड़ों में मिली। अदालत ने साक्ष्य की जांच और उसके संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
अदालत के फैसले के मुताबिक, इस सीडी की फॉरेंसिक जांच नहीं कराई गई थी। साथ ही इसे सेना के किसी विशेषज्ञ के पास भी परीक्षण के लिए नहीं भेजा गया था।
इतना ही नहीं, जिस कंप्यूटर से सीडी बरामद किए जाने का दावा किया गया था, उसकी भी पुलिस द्वारा जब्ती नहीं की गई थी। ऐसे में सीडी की प्रामाणिकता और उसके बरामद होने की परिस्थितियों को लेकर अभियोजन के साक्ष्य पर सवाल खड़े हुए।
साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को मिली राहत
लंबे समय तक चले इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद मुख्य आरोपी जमील अहमद को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।
22 साल पुराने इस मामले में अदालत के फैसले के बाद अभियोजन द्वारा पेश किए गए महत्वपूर्ण साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उनकी जांच-पड़ताल की प्रक्रिया पर भी सवाल सामने आए हैं।





















