रामायण या महाभारत जो दूरदर्शन पर दिखाई जा रही है वो स्वयं बताती है कि ”वासुदवे कुटुम्बकम्” की भावना की प्रबलता ही हमारी संस्कृति है।
सत्यम् लाइव, 17 अप्रैल 2020 ।। दिल्ली भारत एक कृषि प्रधान देश है इसी कारण से भारतीय अर्थव्यवस्था को, कृषि आधारित कहा जाता है। कोई भी देश अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिये, अपनी जलवायु आधारित व्यवस्था ही बनाता है। ये कथापि सम्भव नहीं है कि जिस स्थल पर बहुत अधिक वर्षा हो या न हो, उन स्थलों पर खेतों पर लहलहाती हुई फसल दिखाई दे। भारत देश में एक पुरानी कहावत है कि ‘‘उत्तम खेती, मध्यम वान, करत चाकरी कुकर निदान।’’ ये कहावत बताती है कि खेती सदैव से ही उत्तम कर्म रहा है और व्यापार को, मध्यम कर्म माना गया है। नौकरी करना तो कुत्ते का काम करना कहा गया है। भारत देश में किसान को देश की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। हर देश अपना विकास सदैव ही, अपनी ही पूँजी से करता है। भारत की डगमगाती अर्थव्यवस्था ने, इस विषय पर कुछ जानने की मेरी इच्छा प्रकट प्रकट हुई। जब जानना चाहा तो ज्ञात हुआ कि रीढ़ की हड्डी ही कमजोर हो चुकी हैं तो भला कैसे पूरा शरीर मजबूत रहेगा। मेरी जहाॅ तक समझ बनी कि कृषि प्रधान देश के लिये आज की शिक्षा को लेकर यदि समझा जाये तो यह श्रमिक वर्ग पश्चिमी चश्में से ही दिखाई पडेगा। कृषि प्रधान देश में श्रमिक ज्यादा होगें तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए बल्कि ये कहना उचित होगा कि हर व्यक्ति को अपनी भूमि को रोपना आना ही चाहिए। अर्थशास्त्र के अनुसार श्रमिक तीन प्रकार के होते हैं श्रमिक कृषि के क्षेेत्र में 60 प्रतिशत है 17 प्रतिशत उद्योग मेंं लगे हुए हैं और 23 प्रतिशत श्रमिक सेवा के क्षेत्र में लगे हुए हैं। आधुनिकता का ऐसा चश्मा चढ़ा कि रीढ़ की हड्डी हमें दिखाई नहीं देती है।

भारत में 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, कुल जनसंख्या 139.27 करोड़ है गरीबी रेखा के नीचे 25 प्रतिशत अर्थात् 34.82 करोड़ लोग हैं। 2018 के बाद अब 2020 में जब नोवेल कोराना वायरस ने पूरी दुनिया में पाॅव पसारे हैं। आईएमएफ ने कहा है कि 40 करोड लोग पूरे एशिया में बेरोजगार लॉकडाउन के बाद हो जायेगें। और जीडीपी शून्य हो जायेगी।
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भारत के सभी अर्थशास्त्री का कहना है कि गरीबी रेखा के नीचे अब लगभग 6 करोड़ लोग होगें। यह आंकड़ा बड़ा भयावह है परन्तु नौकरी पेश वाला व्यक्ति लगभग 5-7 करोड़ बेरोजगार होने की आशांका है। भारत के अर्थशास्त्रीय पहले ही कह चुके हैं कि भारत का जीडीपी शून्य है। सेन्टर फाॅर माॅनिटरिंग इंडियन इकोनाॅकी की रिपोर्ट के अनुसार लाॅकडाउन से शहरों में 30.2 प्रतिशत तब बेरोजगारी आ सकती है लगभग 18 हजार छोटा व्यापारी बेरोजगार हो सकता है ये वो व्यापारी है जो कहीं खड़ा होकर, अपने पेट पालन के लिये कुछ उद्योग कर लेता था। इसी व्यापारी को तत्कालिक सहायता के रूप में एक-एक हजार रूपये डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से सीधे बैंक में भेजे जा रहे हैं अर्थात् ये फायदा भी सिर्फ उसी को मिलेगा जिनके बैंको में खाते होगें और ऐसी खबरें आना प्रारम्भ हो गयी हैं जिनके पास राशन कार्ड नहीं है या खाता नहीं है उनको भारतीय मानस, मानवता पूर्ण कुछ दे दो तो ठीक अन्यथा वो अपने प्राण गवां रहे हैं। इस नियम के अन्तर्गत शहरी क्षेत्रों में और गाॅव में आरटीजीएस के माध्यम से खातों में रूपये डाले जा रहे हैं। श्रम विभाग द्वारा कुल पंजीकृत 28,437 श्रमिकों में से 12,998 को रूपया मिला है जबकि 1 करोड़ 29 लाख श्रमिक पंजीकृत नहीं है जबकि सभी श्रमिक पंजीकृृृत नहीं है।

लॉक डाउन थमी दुनिया
भारतीय श्रमिक को नजर अन्दाज किये जाना ही सबसे ज्यादा भारतीय परम्परा का नुकसान है ये श्रमिक चालाक नहीं होते हैं इन मासूमों को कभी भी, कोई भी, इन्सानियत के नाम पर ठग लेता है तो कोई इनकी कहानी पर ऑसू बहाकर ठग लेता है और तो कोई इनको राम, कृष्ण की कथा सुनाकर अपना उल्लू सीधा करता है। राजनीतिज्ञ भी जाति पाति के नाम पर ठग लेते हैं। ये इस बार जो ठगे जाने वाले हैं उसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता है। हमारी सरकारें लगातार टीवी के माध्यम से बताती रहेगी कि किसी को भी भूखा नहीं मरने देगें और स्वयं भर पेट खाकर सो जायेगें। जितना नोवेल कोरोना का मरीज डाॅॅॅॅॅक्टर से इलाज करा रहा है उतना ही श्रमिक प्रशासन की मार सेे डॉक्टर के पास पहुॅचा है और वो ज्यादातर श्रमिक ही है। ताज्जुब ये होता है जब प्रशासन के ईमानदार एक सिपाही की दशा देखो तो वो भी इन्हीं श्रमिक की श्रेणी में आता है और उसी को इनकी दशा नहीं पता। सरकार ने दिये अगर 500 रूपये तो इलाज में या जमानत में लगाये लगभग 1000 रूपये। भारतीय श्रमिकों से पूछो तो अपनी व्यथा बताते हैं कि घर में खाने को नहीं हैै बाहर निकलो तो पुलिस मारती है ऐसे समस्या वहीं से ज्यादा आयी हैं। प्रशासन से पूछो तो वो कहते हैं लॉकडाउन का कानून तोडा था इन्होंने और मारा भी ऐसे गया है कि आतंकवादी हो। साधारण खाने पीने वाला व्यक्ति क्या करें ? बहराल गलती किसी की भी हो ? ये गलती अब महामन्दी से होकर अकाल की दशा तक कैसे जा सकती है ? भारतीय अर्थशास्त्रीय क्या कह रहे हैं ? देखते हैं।
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उपसम्पादक सुनील शुक्ल





















