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डा. रामअवतार शर्मा जी दुरा श्री राम वन यात्रा…

SATYAM LIVE (Web Desk) by SATYAM LIVE (Web Desk)
January 29, 2017
in उत्तर प्रदेश
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डा. रामअवतार शर्मा जी दुरा श्री राम वन यात्रा...
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1. ये ऐतिहासिक कार्य करने की प्रेरणा आपको कैसे मिली ?
उत्तरः हर मनुष्य के जीवनकाल में कुछ ऐसा वक्त आता है जो बहुत सामान्य सा लगता है परन्तु कभी-कभी इन्हीं बचपन की सामान्य सी बातों की मनुष्य पर ऐसी गहरी छाप पड़ जाती है कि उसका लक्ष्य निर्धरित हो जाता है, उसी तरह मैं भी अपनी दादी, नानी, माँ या चाची, मामी से कुछ ऐसे गीत सुनता था, जिससे मुझे ये लगता था कि श्रीराम, लक्ष्मण तथा माता सीता ने अपने वनवास काल में बहुत सा कष्ठ सहा था और उस समय के गीतों में इतना जीवंत चित्राण होता था कि कभी-कभी तो गीत गाने वाली माताएँ उन्हीं क्षणों को जीने लगती थी और रोने लगती थी। सबसे पहले तो उन्हें से प्रेरणा प्राप्त हुई। जैसे ‘‘सीता के तप उठी बदरिया बरसी मूसलधर’’ परन्तु जब मैं इन कष्टों की कल्पना कर मैं अकेले में सोचता था, और माताओं से पूछता था तो मन को संतुष्टि करने वाले उत्तर प्राप्त नहीं होते थे। मेरा निरन्तर चिन्तन प्रारम्भ रहता था कई बार भगवान शिव के मन्दिर में बैठा इस संकल्प को आरध्य शिव के सामने दोहराया परन्तु समय ने करवट ली मैं दिल्ली में गृहस्थ की चक्की में पिसकर संकल्प विस्मरण हो गया। कुछ समय उपरान्त भगवान शिव की शक्ति ने पुनः संकल्प याद कराया। पिफर क्या था तथ्य मिलते गये और मैं उसी मार्ग पर चलता गया रहा।

मैंने श्रीरामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, कम्बन रामायण, रघुवंशम् तथा कई पुस्तकालयों के माध्यम से उस काल में भ्रमण किया, कुछ इस संदर्भ के विद्वानों, कथावाचकों, समाजसेवियों से सहयोग लिया और संदर्भ प्रश्न-उत्तर का सत्रा निरंतर 5 वर्षों तक चलता रहा परन्तु समस्या ने पिफर मुझे घेर लिया। सरकारी सेवा में अवकाश की भी एक मर्यादा में ही मिलता है आर्थिक दवाब भी आना स्वाभविक था। बाधयँ तो आयी, दायित्व की पूर्ति श्रीराम सेवक हनुमान जी बनाते चले गये। भारत सरकार के ‘‘संस्कृति विभाग’’ ने मेरी एक परियोजना ‘‘वनवासी राम और लोक संस्कृति’’ स्वीकार कर ली अब शोध् का कार्य सरलतापूर्वक होने लगा।

2. आपकी यात्रा किस सन् से प्रारम्भ हुई थी तथा श्रीराम की पृथ्वी लोक पर अवधि् कितनी पुरानी है ?

उत्तरः शोध् की यात्रा सन् 1976 से प्रारम्भ हुई तथा मैनें श्रीराम वनगमन यात्रा सन् 2005 से की जा रही है। श्रीराम की पृथ्वी लोक पर होने के प्रमाण पर मैं बहुत विद्वता नहीं रखता परन्तु यहां पर अलग-अलग मत हैं जैसे मुस्लिम विद्वान हयातुल्ला की बात करें तो उनका मानना है लगभग 23 लाख वर्ष बीत चुके हैं। सनातन परम्परा के अनुसार लगभग 9,84,000 वर्ष पुरानी मानी जाती है। प्रमाणों की दृष्टि से हम प्राचीन भवनों के अवशेष, मिलना तो संभव ही नहीं है सभी कुछ मिट्टी में मिल चुका है, न जानें कितनी बार नदियों ने अपने मार्ग बदले होगें। डा. स्वराज प्रकाश गुप्ता जी जो स्वयं पुरातत्वविद हैं की टिप्पणी उचित लगती है कि हम तत्व का आंकलन करेंगे तो अर्थ का अनर्थ ही करेंगे। महाभारत की घटना 5000 वर्ष पुरानी है तथा रामायण को 3000 वर्ष पुराना पुरातत्व विभाग वाले कहते हैं यदि ये बात सत्य भी मान लें तो कैसे ? महाभारत काल में रामायण के पात्रों के नाम मिलते हैं परन्तु रामायण में महाभारत के पात्रों के नाम नहीं मिलते। एक तो इतने पुराने प्रमाण मिलते ही नहीं दूसरे परतंत्राता के काल में सभी मानते हैं कि मन्दिरों, पुस्ताकलयों तथा संस्कृत के ग्रन्थों को नष्ट किया गया है अतः प्रमाण की आशा क्षीण हो जाती है।

3. किस-किस गं्रथों के सहायता से आपने ये खोज प्रारम्भ की, अब तक कितने स्थल तथा मार्ग मिलें है ?
उत्तरः शुरूवात में तो श्रीरामचरित मानस और वाल्मीकि रामायण तथा अन्य कई क्षेत्राय रामायण से शोध् का कार्य प्रारम्भ किया परन्तु जो सत्य है वो ये कि लोकगीत, लोककथाएं, भारतीय नृत्य गीत, किवदंतियां तथा सौभाग्यवश बचे हुए तीर्थ स्थल, पहाड़ों में बचे हुए मन्दिर तथा आश्रम जो इन मूर्तिभंजकों, आताताहियों के हाथों से दूर थी से बहुत सहायता मिली। यह भी सत्य है कि समाज की उपेक्षा अथवा आये आर्थिक संकट के कारण दूरदराज के पवित्रा स्थल लुप्त हो गये है। शोध् यात्रा में अनेकों ऐसे स्थल मिले हैं जो लुप्त होने की कगार पर हैं। इन 40 वर्षों में भगवान शिव की कृपा से उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा, बिहार, नेपाल, आंध््रप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के अनेक सुदूर स्थलों के भ्रमण कर इन लोक कथाओं, लोकगीत का संग्रह किया है। ये भगवान शिव की कृपा ही है कि आज तक 290 पवित्रा स्थलों के दर्शन भी मिल चुके हैं। अब मार्ग की चर्चा करने से पूर्व से बात स्पष्ट कर देता हूँ कि श्रीराम किस पगडंडी से गये होगें ये कह पाना इतना सरल नहीं है, क्योंकि लम्बी कालावधि् न जाने कितनी बार मार्ग बदले होगें, न जाने कितनी बार नदियों ने भी अपने मार्ग बदल लिये होगें और न जाने कितनी बार भूमि ने भी उथल-पुथल किया होगा। कहानियों के आधर पर मिंन्दरों और इमारतों का निर्माण तो हो सकता है परन्तु प्रकृति का निर्माण सम्भव नहीं है अतः मार्ग पर कोई विशेष टिप्पणी नहीं की जा सकती। मार्गों के बहुत संकेत भी नहीं मिलते और जिन स्थलों के नाम मिलते हैं उसमें शब्दों के अपभ्रंश के रूप में पहचाना जा सकता है क्यों कि कुछ अपभं्रश के अर्थ ही नहीं निकलते हैं।

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4. आप भाषा विज्ञान के विद्वान हैं आपने नामों के अपभ्रशों को कैसे उपयोग किया ?
उत्तरः मानस के 7 कांडों में से 6 कांडों में जनकपुर यात्रा तथा श्रीराम वनवास का वर्णन किया गया है। श्रीराम की जनकपुर यात्रा का मार्ग लगभग सीध्े-सीध्े है। जाते समय वो बक्सर ;बिहारद्ध में विश्वामित्रा के आश्रम होते हुए जनकपुर ;नेपालद्ध जाते हैं तथा वापसी में बारात के साथ सीध्े-सीध्े जनकपुर ;नेपालद्ध से अयोध्या ;उ.प्र.द्ध आते है। इस यात्रा में पैफजाबाद, आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बलिया, बक्सर, पटना, वैशाली, दरभंगा, मध्ुबनी, जनकपुर, सीतामढ़ी, पूर्वी चम्पारन तथा गोरखपुर के 41 स्थल मिलते हैं किन्तु 14 वर्ष के वनवास में से केवल 4 वर्ष का वर्णन है। अब इन स्थलों के नाम तो जस-के-तस मिलते हैं परन्तु कुछ स्थलों में भ्रम अवश्य होता है जैसे छत्तीसगढ़ में रायपुर के पास राकसहाड़ा अब इन शब्दों को सन्धि्-विच्छेद करना पड़ेगा इनका अर्थ मिलता है राक्षस की हड्डियां। अर्थात् राक्षस की हड्डियां का वर्णन आपको खोजना पड़ेगा तो उस स्थान पर श्रीराम ने अत्याध्कि राक्षसों को मारा है। वैसे ही भये दर्शन के अर्थ पर अगर स्थल खोजना है तो भादर्श को सन्धि्-विच्छेद करो। माण्डव्य-मंडपफा, मार्कण्डेय-मारकुंडी, श्रृंगवरपुर-सिंगरोर, सीतापुर-छीतापुर, रथेवा-रैथवा, गौरवघाट-गौराघाट, रामशैल-रामसेलवा, नासिका कर्तन-नासिक, बाणहोरा-बाणावर, टारडीह-टाडीह, भये दर्शन-भादर्श, भरतपुर-भारतपुर, सूर्य कुण्ड-सूरज कुण्ड, )षियन-रिखियन, कुमार द्वय-कुंवर दो, स्पफटिक शिला-पफटिक शिला, पुष्करणी-पोहकरणी, शरभंग-शरभंगा, स्वरगुंजा-सरगुजा, तुलसी बगीचा, शबर नारायण-सिबरी नारायण, लक्ष्मेश्वर-लक्ष्मणेश्वर, शोणितपुर-श्रीपुर-शिवपुर-सिरपुर, बगेश्वर-बागेश्वर, श्रृंगीनाला-सगरीनाला, श्रृंगी-सिहावा, मुचकुंद-मैचका, गुरूकुल-घोटुल, कंकपुर-कांकेर, राक्षस की हड्डिया-राकस हाड़ा, राक्षस डोंगरी-रक्सा डोंगरी, लवणपुर-लोणार, रामद्वार-रामदरिया, शबरी वन-सुरेबान, त्रिशिरापल्ली-त्रिचुरापल्ली, सेतुकोटई-छेदु कुरई, नदियों के वेदश्रुति नदी-विसुही, स्यंदिका-सई, बालुकिनी-बकुलाही इत्यादि स्थानों के नाम परिवर्ततन की लम्बी सूचि है।

5. इस संदर्भ में देश के जनमानस की क्या धरणा है ?

उत्तरः आज के समाज में वास्तव में दो वर्ग खड़े हैं एक वो गांव का किसान अर्थात् जिसको अनपढ़ कहते हैं और दूसरा वो जो वर्ग पढ़ा-लिखा है ये शब्द कहते हुए बड़ा दुःख होता है कि पढ़ा-लिखा वर्ग इस ऐतिहासिक घटना को उपन्यास मानकर दोषारोपण करता नजर आता है और जिन वनवासियों ने इन महान कवियों का नाम भी नहीं सुना, जिनके पास आध्ुनिक जानकारी व सुविध मिलना तो दूर उनके पास तन ढ़कने के लिए वस्त्रा भी नहीं हैं वे बताते हैं कि यहाँ पर माता-सीता ने माँ तुलसी के गुणों का वर्णन किया और ज्वर से बचने के लिए औषधि् तैयार करना सिखाया था, वहाँ पर माता ने महिलाओं को बांस से टोकरी बनाना सिखाया था। कुछ स्थानों के किसान बताते हैं कि श्रीराम और लक्ष्मण ने लोगों को हल चलाना सिखाया था। वैसे ही इलाहाबाद का अक्षयवट की पूजा और परिक्रमा की थी, आज भी सारे प्रमाण स्वतः स्पष्ट है अक्षय का अर्थ होता है क्षय अर्थात् नाश न होना। वंडा वनवासी महिलाएं सिर मुंडवाना सीता माँ का श्रॉप मानती हैं, सरगुजा की माताएँ भी सीता माता का श्राप मानती हैं। जहाँ-जहाँ श्रीराम ने राजा दशरथ का श्रा( किया था वहां पर आज भी श्रा( होता है। श्रीराम की कथाओं के आधर पर हजारों स्थानों पर आज भी मेले तथा स्नान का आयोजन होता है। आज भी वनवासी कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने रावण की सेना से यु( किया था और काशी से आये ब्राह्मणों के बंशज बताते हैं कि हमारे पूर्वजों ने ब्रह्म-हत्या के लिये यज्ञ कराया था।

6. ये जो दो वर्ग भारत वर्ष में है उनमें से कौन सा वर्ग आपके साथ सच्ची श्र(ा के साथ काम कर रहा है ?
उत्तरः निःसन्देह जो उस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।

7. रामायण केवल विश्वास व श्र(ा की कथा है या उसमें कुछ वैज्ञानिकता भी है ?
उत्तरः रामायण में श्र(ा और भक्ति तो है ही यदि हम रामायण का गंभीर रूप से अध्ययन करें तो उसमें जीवन के सभी पहलूओं का विवेचन किया गया है राज्य, राजनीति, कूट-नीति, इतिहास, भूगोल, सेना, खजाना, राजा तथा प्रजा का कर्तव्य, अध्किर, ज्योतिष, आयुर्वेद, राष्ट्र के प्रति कर्तव्य पारिवारिक सम्बन्ध् कृषि, पर्वतों, नदियों सभी चीजों का विस्तार से वर्णन किया गया है अध्यानार्थ जो कुछ खोजना चाहता है सभी कुछ रामायण में मिलता है किन्तु तथाकथित बु(जीवियों में रामायण का अध्ययन करने के बजाय निरर्ध्क टीका-टिप्पणी की है हमें न तो उसकी चिन्ता करनी चाहिए, न ही भ्रमित होना चाहिए। गौस्वामी तुलसीदास जी ने पहले ही लिख दिया है कि जिनमें श्रीरामचरित मानस को समझने का सामर्थ नहीं है वे उसका उपहास ही करेंगे।

8. आपकी गाड़ी में क्या आज तक ए.सी. इसीलिए नहीं लगा है ?
उत्तरः श्रीराम के पास तो सम्भवतः पदूकाएं भी नहीं थी हम गाड़ी में चल रहे हैं। वनवासी रामभक्तों को ए.सी. की आवश्यकता नहीं होती है।

9. कुछ नदियों के नाम का भी सहारा मिला था आपको ?
उत्तरः किसी भी ऐतिहासिक शोध् में मार्ग निर्धरण में नदियों का अत्यन्त महत्व है, उस काल में नगर तथा ग्राम तो नहीं के बरावर है केवल नदियों का ही विशेष प्रमाण मिलता है श्रीराम की यात्रा में तमसा, वेदश्रुति, गोमती, स्यंदिका, बालुकिनी, वद्रथी, यमुना, गंगा, मंदाकिनी, गोदावरी, तुंगभद्रा आदि नदियों का नाम आता है। अरण्य काण्ड के अध्याय 7 में प्रथम, द्वितीय, तृतीय श्लोक के अनुसार श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण भईया ने अगाध् जल भरी नदियों को पार किया उस समय )षियों-मुनियों के आश्रम तथा मार्ग, नदियों के किनारे-किनारे ही हुआ करते थे। शोध् से प्राप्त तथ्यों के अनुसार श्रीराम 15-20 किलोमीटर यमुना जी के किनारे-किनारे चले हैं। मंदाकिनी, शबरी नदी तथा महानदी के किनारे-किनारे एक लम्बी यात्रा की है। लंका जाते समय तुंगभद्रा तथा काबेरी नदी के किनारे लम्बी यात्रा की है।

10. नवयुवकों के लिए में आप कोई विशेष संदेश देना चाहेगें ?
उत्तरः श्रीराम के नवयुवक भक्तों एक विशेष संदेश तो नहीं एक आग्रह जरूर करना चाहूगाँ कि इस ऐतिहासिक घटना को कल्पनामात्रा न मानकर उन शेष स्थलों, मार्गों तथा नदियों पर शेध् कार्य और आगे तक ले चलें। इस ऐतिहासिक घटना में एक बहुत महत्वपूर्ण विषय पर अवश्य को कार्य करना चाहिए और वो है दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, रामराज में कहतु न ब्यापा।

डा. रामअवतार शर्मा जी को जय श्रीराम कहते हुए, जो आदेश श्रीराम के नवयुवक भक्तों से दिया उसका पक्षध्र भी हूँ, डा. साहब के चरणों में बैठकर अगर ज्ञान प्राप्त हो, अपने से पूर्वजों के बताये हुए मार्ग पर चलने का सौभाग्य भी प्राप्त होगा और यही बात गीता में भगवान कृष्ण ने अध्याय 4 के श्लोक 5 में अर्जुन से कहा है कि

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरू कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतर कृतम्।।

अर्थात् पूर्वकाल में हमारे पूर्वजों ने भी अपने पूर्वजों को जानकर कर्म किया है इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा के लिए किये जाने वाले कर्म कर। ……. सभी भक्तों को जय श्रीराम

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