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नीरज : सतरंगी रेखाओं की सादी तस्वीर

SATYAM LIVE (Web Desk) by SATYAM LIVE (Web Desk)
July 24, 2018
in उत्तराखंड, विज्ञापन
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गोपालदास सक्सेना ‘नीरज
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दिल्ली: सम्पूर्ण मानवता को एक नई फिजा, एक नया परिवेश देने, हममें सौन्दर्यप्रेम एवं राष्ट्रीयता का भाव जागृत करने, जीवन की सचाइयों का प्रकाश उपलब्ध कराने, हमें आध्यात्मिक एवं मानसिक शक्ति प्रदत्त करने, हममें सच्चा संकल्प एवं कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता उत्पन्न करने वाला लाखों-लाखों रचनाकारों की भीड़ में एक अनूठा एवं जमीन से जुड़ा रचनाकार हमसे जुदा हो गया। पद्मभूषण से सम्मानित हिंदी के साहित्यकार, कवि, लेखक और गीतकार गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ का चिरनिद्रा में विलीन हो जाना न केवल हिन्दी साहित्य की बल्कि सम्पूर्ण मानवता की एक अपूरणीय क्षति है। सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्वदैशिक रचनाओं से हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने वाले नीरजजी की कलम से निकले गीतों के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित होने के अलावा तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।

 

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नीरजजी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हिंदी के माध्यम से जहां उन्होंने साधारण पाठकों के मन की गहराई में अपनी जगह बनाई वहीं गंभीर पाठकों के मन को भी गुदगुदा दिया। उनकी अनेक कविताओं के अनुवाद गुजराती, मराठी, बंगाली, पंजाबी, रूसी आदि भाषाओं में हुए। दिनकर उन्हें हिंदी की ‘वीणा’ मानते तो अन्य भाषा-भाषी ‘संत कवि’ की संज्ञा देते थे। उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व बहुआयामी था, वे सतरंगी रेखाओं की सादी तस्वीर थे, तो गहन मानवीय चेतना के चितेरे थे। उनमें एक प्रेरणाप्रद मुस्कराता चेहरा दिखाई देता तो वे दिल में रख लेने के काबिल महामानव थे। उन्हें हम निराशा के कवि मानते थे, तो वे रोमांटिक कवि भी थे, वे गीतकार थे तो दर्शन के कवि भी थे। वे मंच के कवि थे और न जाने क्या-क्या, लेकिन तमाम वाद-विवादों और अवरोधों के बावजूद उन्होंने हिंदी कविता का दामन नहीं छोड़ा, हिन्दी कविता को समृद्ध किया और हमेशा ही सही और अच्छी कविता के पैरोकार बने रहे। वे कहीं सामाजिक हो विसंगतियों पर चोट करते थे तो कहीं देश की व्यवस्था को तल्ख लहजे में डांटते नजर आते थे। उन्होंने काव्य को साधना माना तो जीवन संतुष्टि के प्रयोग का माध्यम भी। उन्होंने काव्य-धरातल पर हर तरह की आकृति सजाने की कोशिश की है, वहीं उन्होंने तमाम विधाओं मसलन गजल, दोहा, हाइकू आदि को बड़ी शिद्दत के साथ साथ निभाया। उनके रचना-संसार का फलक इतना व्यापक है कि उन्हें शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। उन्हें प्रेम-शृंगार तक सीमित रखना भी ठीक नहीं, क्योंकि जीवन-दर्शन पर उनकी कलम ने प्रेरणा का नया इतिहास रचा है। आदर्श एवं यथार्थ की अन्विति होने से उनकी रचनाएं अधिक जनभोग्य, प्रेरक एवं आकर्षण का केन्द्र बनी हैं।

 

नीरज का व्यक्तित्व भी निराला था। बिखरे बाल और 93 की उम्र में भी उनका जज्बा देखते ही बनता है। वे तो कवि सम्मेलन को जीवन की प्रयोगशाला ही मानते थे। उन मंचों की आंख से जिंदगी को गुनगुनाते हुए कहते थे-चलता हूं, अभी चलता हूं, एक गीत और जरा झूम के गा लूं तो चलूं। यही वजह है कि उनके फिल्मी गीत, वो चाहे कारवां गुजर गया…, लिखे जो खत तुझे…, दिल आज शायर है…, शर्मीली ओ मेरी शर्मीली…, ऐ भाई जरा देख के चलो…, रंगीला रे तेरे रंग में… आदि कालजयी गीत आज भी मील का पत्थर बने हुए हैं, जन-जन की जबान पर गुनगुनाये जाते हैं। ये उनका कार्यकौशल ही था कि उनको पहली बार सन् 1955 में भजन ‘काल का पहिया घूमे भइया’ पर फिल्म फेयर अवार्ड से नवाजा गया।

 

नीरज रुमानियत और शृंगार के कवि माने जाते थे पर उनकी कविताओं में जीवन दर्शन भी काफी गहराई से उभरकर आता है। नीरज का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गांव में हुआ। मात्र छह साल की उम्र में पिता ब्रजकिशोर सक्सेना का साया उनके उपर से उठ गया। नीरज ने 1942 में एटा से हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया। बाद में दिल्ली जाकर सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी करने लगे। दिल्ली से नौकरी छूट जाने पर वे कानपुर आ गये और वहां डीएवी कॉलेज में क्लर्क की नौकरी की। फिर एक प्राइवेट कंपनी में पांच साल तक टाइपिस्ट का काम किया। कानपुर के कुरसंवा मुहल्ले में उनका लंबा वक्त गुजरा। नौकरी के साथ ही प्राइवेट परीक्षाएं देकर उन्होंने इंटरमीडिएट से हिन्दी साहित्य में एमए तक पढ़ाई की। 93 वर्ष की उम्र में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उन्होंने अन्तिम सांस ली।

 

नीरज हिंदी काव्य मंचों पर काफी लोकप्रिय थे। देश में कवि सम्मेलनों को आम जनता तक पहुंचाने में तीन लोगों का सबसे बड़ा योगदान रहा है। हास्य के लिए काका हाथरसी का, गीत के लिए गोपाल दास नीरज का और वीर रस के लिए बालकवि बैरागी का। ‘कितने ही कटुतम कांटे, तुम मेरे पग में आज बिछाओ, और अरे चाहे कर का भी धुंधला दीप बुझाओ। किंतु नहीं मेरे पग ने पथ पर बढ़कर फिरना सीखा है, मैंने बस चलना सीखा है- पंक्तियों के रचनाकार नीरज अपनी गंध को खुद में ही समेटे एक निराला एवं फक्कड व्यक्तित्व थे। संवेदनशीलता, सूझबूझ, हर प्रसंग को गहराई से पकड़ने का लक्ष्य, अभिव्यक्ति की अलौकिक क्षमता, शब्दों की परख, प्रांजल भाषा, विशिष्ट शैली आदि विशेषताओं एवं विलक्षणताओं को समेटे न केवल अपने आसपास बल्कि समूची दुनिया को झकझोरने वाले जीवट वाले व्यक्तित्व थे नीरजजी। सच ही कहा है किसी ने कि कवि के उस काव्य और धनुर्धर के उस बाण से क्या, जो व्यक्ति के सिर में लगकर भी उसे हिला न सके।

 

कविता पाठ के रसिक एवं भारत के कवि-मंचों की शान नीरजजी को अपने ओजपूर्ण स्वरों मे मंच पर कविता पाठ करते मैंने अनेक बार सुना है। मुझे उनके अनेक खत मिले, चाहे सामाजिक प्रसंग हो या आध्यात्मिक, चाहे सांस्कृतिक अवसर हो या साहित्यिक- वे हर पत्र का जबाव देते। खतों से उनका जो आत्मीय चेहरा उभरा, वह मेरे स्मृति पटल पर अमिट छाप बनाये हुए हैं। ‘अणुव्रत’, समृद्ध सुखी परिवार जैसी पत्रिकाओं का सम्पादन करते हुए उन्होंने जो स्नेह और सहयोग दिया, वह उनकी सरलता के साथ-साथ सादगी को उजागर करता है। नीरजजी मृदुभाषी और सौम्य व्यक्तित्व के धनी थे और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। उनकी अनेक विशेषताओं में एक विरल विशेषता थी कि वे विविधता में एकता की प्रतिमूर्ति थे। वे बाहर-भीतर एक समान थे। मैं तो उन्हें स्नेह की छांह देने वाला बरगद मानता हूं।
नीरजजी ने कविता को जनप्रिय बनाया। उन्हीं के कारण कविता लाइब्रेरी से निकलकर आम-जनमानस के होठों की सूक्ति बन गई। वे अकेले ऐसे विद्रोही कवि थे, जिन्होंने स्वयं को विद्रोही कहकर ‘मैं विद्रोही हूं जग में विद्रोह करने आया हूं’, हर आलोचक, समालोचक, वाद-विवाद या हर चर्चा में अपना नाम शिद्दत के साथ उठवाने, चुप रहकर या विरोध करने की क्षमता काबिलियत से पैदा की थी। बच्चनजी के बाद जो पीढ़ी जिसमें वीरेंद्र मिश्र, रमावतार त्यागी, दिनेश, रामानाथ अवस्थी, भारत भूषण आदि जिन लोगों ने गीत की पताका को गौरव और सम्मान से आगे रखा है, उनमें नीरज ने लोकप्रियता का वो शिखर छुआ, जिससे आज की नई पीढ़ी सिर्फ सोच भर सकती है।

 

संघर्षों एवं तकलीफों में तपा यह विरल व्यक्तित्व स्वयं में एक संस्था थे। शब्दों के आलोक को फैलाने के ध्येय के लेकर आपने पुरुषार्थ किया। स्वयं के अस्तित्व एवं क्षमताओं की पहचान की। संभावनाओं को प्रस्तुति मिली। शनै-शनै विकास और साहित्य के पायदानों पर चढ़े। इन शिखरों पर आरूढ़ होकर उन्होंने साहित्य और राष्ट्र सेवा का जो संकल्प लिया, उसमें नित नये आयाम जुड़े। सचमुच यह उनका बौद्धिक विकास के साथ आत्मविकास चेतना का सर्वोत्कृष्ट नमूना है। ऐसे साहित्यसेवी और शब्द-चेतना के प्रेरक सेवार्थी एवं सृजनधर्मी व्यक्तित्व पर हमें नाज है। उनका घटनाबहुल रचनात्मक और सृजनात्मक जीवन ताजी हवाओं से ही रू-ब-रू कराता रहा है। उनसे प्रेरणा लेकर हमें उन नैतिक एंव मानवीय उच्चाइयों पर पहुंचना है, जो हर इंसान के मनों में कल्पना बन कर तैरती रही हैं। हमारे समाज एवं समय की वे दुर्लभ प्रकाश किरणें हैं, जिनसे प्रेरणा पाकर हम जीवन को धन्य कर सकते हैं। अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकते हैं।
प्रेषक
(ललित गर्ग)

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