नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण फ्लैश फ्लड और भूस्खलन ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी। आपदा के करीब एक सप्ताह बाद संसद के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने देश में पैदा हुए हालात की गंभीरता सामने रखी। उन्होंने कहा कि इस बड़े संकट से उबरने के लिए नेपाल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक और मानवीय सहायता के साथ-साथ जलवायु न्याय (Climate Justice) की भी जरूरत है।
प्रधानमंत्री के मुताबिक, आपदा में अब तक 1,243 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 4,875 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। राजधानी काठमांडू के आसपास के तीन प्रमुख जिलों में नेपाली सेना और आपदा प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियां राहत एवं बचाव अभियान में लगातार जुटी हुई हैं।
अचानक आई बाढ़ की तीव्रता ने बढ़ाई चुनौती
संसद के विशेष सत्र में प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि 26 अगस्त को आई बाढ़ की रफ्तार और भयावहता इतनी अधिक थी कि उसका सटीक अनुमान लगाना बेहद मुश्किल था। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक आपदा के बाद सरकारी एजेंसियों ने तेजी से राहत और बचाव अभियान शुरू किया।
नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल ने संयुक्त रूप से कई इलाकों में अभियान चलाया। कठिन परिस्थितियों के बीच अब तक 13,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए जाने की जानकारी दी गई है।
जलवायु परिवर्तन को लेकर विकसित देशों पर सवाल
प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने आपदा के व्यापक प्रभाव का जिक्र करते हुए वैश्विक जलवायु संकट को भी प्रमुख मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि नेपाल जैसे पर्वतीय और हिमाच्छादित देश वैश्विक स्तर पर होने वाले कार्बन उत्सर्जन में अपेक्षाकृत कम योगदान देते हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणामों का सामना उन्हें करना पड़ रहा है।
शाह ने औद्योगिक देशों के ऐतिहासिक और वर्तमान कार्बन उत्सर्जन की ओर इशारा करते हुए कहा कि जलवायु संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित कमजोर देशों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सहयोग मिलना चाहिए।
नेपाल ने मांगा क्लाइमेट जस्टिस
नेपाल सरकार का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों से निपटने के लिए केवल आपदा के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। प्रभावित देशों को आपदा से बचाव, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और भविष्य के जोखिमों को कम करने के लिए वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री शाह ने जोर देकर कहा कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है, इसलिए इसके प्रभावों से होने वाले नुकसान और जोखिमों की जिम्मेदारी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा की जानी चाहिए। नेपाल ने इसी संदर्भ में आर्थिक एवं मानवीय सहायता के साथ क्लाइमेट जस्टिस की मांग उठाई है।

























