सत्यम् लाइव संवाददाता, खोड़ा, गाजियाबाद। गाजियाबाद के खोड़ा स्थित वार्ड नंबर 23, हिमालय एंक्लेव के प्राचीन शिव शक्ति दुर्गा मंदिर परिसर में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर नजर आए। अयोध्या धाम से पधारे कथा व्यास संत श्री श्यामदास जी महाराज ने अपने श्रीमुख से शुकदेव जी के आगमन, राजा परीक्षित को मिले श्राप और श्रीमद्भागवत महात्म्य का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से जुड़े आध्यात्मिक संदेशों को श्रद्धापूर्वक सुना।
प्राचीन शिव शक्ति दुर्गा मंदिर ट्रस्ट के मीडिया प्रभारी पंडित संतोष मिश्रा ने बताया कि कथा के दौरान राजा परीक्षित के जीवन से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से मानव जीवन में आत्मचिंतन, सदाचार और प्रभु स्मरण के महत्व को समझाया गया।

राजा परीक्षित को क्यों मिला सात दिन में मृत्यु का श्राप?
कथा व्यास संत श्री श्यामदास जी महाराज ने राजा परीक्षित के जीवन से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक दिन प्यास से व्याकुल राजा परीक्षित वन में स्थित समीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। उस समय ऋषि ध्यानमग्न थे। राजा परीक्षित को जब उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो क्रोध और कलियुग के प्रभाव में उन्होंने ऋषि के गले में एक मृत सर्प डाल दिया।
जब ऋषि के पुत्र श्रृंगी को इस घटना की जानकारी मिली, तो उन्होंने राजा परीक्षित को सातवें दिन तक्षक नाग के डंसने से मृत्यु होने का श्राप दे दिया। कथा के अनुसार, बाद में राजा परीक्षित को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने राजपाट त्याग दिया और गंगा तट पर पहुंचकर अपने जीवन के अंतिम सात दिन प्रभु स्मरण तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए समर्पित कर दिए।
शुकदेव जी के श्रीमुख से राजा परीक्षित ने सुनी भागवत कथा
कथा में आगे बताया गया कि राजा परीक्षित के जीवन के अंतिम सात दिनों के दौरान परम ज्ञानी शुकदेव मुनि का आगमन हुआ। उनके श्रीमुख से राजा परीक्षित ने श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया।
कथा व्यास संत श्री श्यामदास जी महाराज ने समझाया कि श्रीमद्भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को सदाचार, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के मार्ग पर आगे बढ़ाने वाला दिव्य माध्यम है। भागवत श्रवण से मनुष्य के भीतर आत्मचिंतन, विवेक और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना जागृत होती है।
उन्होंने कथा के माध्यम से यह संदेश दिया कि जीवन में अपनी गलतियों को पहचानना, उनसे सीख लेना और आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर होना महत्वपूर्ण है।
सत्संग से विकसित होता है विवेक और आध्यात्मिक चेतना
प्रवचन के दौरान गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रसिद्ध चौपाई का उल्लेख किया गया—
“बिनु सतसंग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥”
कथा व्यास जी ने बताया कि सत्संग मनुष्य को सही और गलत के बीच अंतर समझने की शक्ति प्रदान करता है। प्रभु की कृपा और संतों के सानिध्य से जीवन में आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है। सत्संग व्यक्ति को आत्ममंथन करने और अपने आचरण में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा देता है।
भजन-संकीर्तन से भक्तिमय हुआ मंदिर परिसर
श्रीमद्भागवत कथा के दौरान भजन-संकीर्तन और आध्यात्मिक प्रसंगों ने पूरे मंदिर परिसर को भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालु भगवान श्रीहरि के गुणगान में भावविभोर नजर आए। कथा के माध्यम से उपस्थित लोगों को भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और प्रभु स्मरण के महत्व का संदेश दिया गया।
मुख्य यजमान सहित मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारी रहे उपस्थित
इस धार्मिक आयोजन में मुख्य यजमान श्रीमती सुमन मिश्रा एवं पंडित श्री शेषनारायण मिश्रा सहित मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री विनोद तिवारी, श्री विनोद कुमार नागर, श्री तेजपाल गुप्ता, श्री हरिश्चंद्र शर्मा, श्री परमात्मा यादव, श्री सूरज सिंह कुशवाह, श्री कृष्ण स्वरूप वर्मा, श्री संदीप मिश्रा, श्री हृदयराम मिश्रा, श्री डी.पी. उपाध्याय, श्री भगवती दुबे, श्री सत्यनारायण गुप्ता, पंडित संतोष मिश्रा, श्री संतोष वर्मा, श्री नारायण सिंह कुशवाह, श्री मनमोहन तिवारी, श्री मनोज चौहान, श्री दिलीप सिंह कुशवाह, श्री लोकेंदर सिंह, श्री पिंटू पाण्डेय, श्री जंगबीर सिंह, श्री संतोष अग्रवाल, श्री समरपाल सिंह, श्री शिवराम सिंह, श्री शंकर पटेल, श्री सुधांशु, श्री दीपांशु, श्री ईशु, श्री अनुराग और श्री डब्बू सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।
श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं ने भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान का श्रवण किया। कथा के प्रसंगों के माध्यम से जीवन में सत्संग, विवेक, सदाचार और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना अपनाने का संदेश दिया गया।
जय श्रीमद्भागवत! जय श्रीहरि!





















