नई दिल्ली, 17 अक्टूबर 2025 — देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल गिरफ्तारी स्कैम (Digital Arrest Scam) पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताते हुए स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लिया है। अदालत ने केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी कर रिपोर्ट तलब की है।
क्या है “डिजिटल गिरफ्तारी स्कैम”?
यह एक नई साइबर ठगी की शैली है जिसमें ठग खुद को CBI, ED या न्यायालय अधिकारी बताकर पीड़ितों को डराते हैं।
वे वीडियो कॉल, व्हाट्सएप या फर्जी कोर्ट आदेशों के जरिए न्यायाधीशों का रूप धरते हैं और गिरफ्तारी या बैंक खाते फ्रीज़ करने की धमकी देकर पैसे वसूलते हैं।
हाल ही में अंबाला के वरिष्ठ नागरिक दंपत्ति से लगभग ₹1.5 करोड़ की ठगी ने इस स्कैम को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे जाली आदेश और हस्ताक्षर न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं और इसे साधारण साइबर अपराध नहीं माना जा सकता।
अदालत ने:
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गृह मंत्रालय, सीबीआई निदेशक, हरियाणा सरकार और अंबाला साइबर क्राइम यूनिट को नोटिस भेजा।
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जांच रिपोर्ट तलब की।
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देशभर में ऐसे मामलों की निगरानी बढ़ाने का निर्देश दिया।
असर और महत्व
यह मामला केवल धोखाधड़ी का नहीं, बल्कि संविधानिक भरोसे और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना से:
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साइबर कानूनों में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट हुई है।
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एजेंसियों और अदालतों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
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जन जागरूकता बढ़ाने की मांग तेज होगी।
️ नागरिक कैसे सतर्क रहें
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किसी भी कोर्ट आदेश की आधिकारिक वेबसाइट पर जांच करें।
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अनजान कॉल या वीडियो कॉल पर वित्तीय जानकारी साझा न करें।
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किसी प्रकार का दबाव या धमकी मिलने पर तुरंत साइबर पुलिस को सूचित करें।
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अपने आस-पास के लोगों को डिजिटल सुरक्षा शिक्षा दें।
निष्कर्ष
“डिजिटल गिरफ्तारी स्कैम” अब केवल तकनीकी धोखाधड़ी नहीं, बल्कि न्यायपालिका और नागरिक सुरक्षा पर हमला है।
सुप्रीम कोर्ट का यह स्वतः संज्ञान भारत में डिजिटल अपराधों के खिलाफ सशक्त न्यायिक हस्तक्षेप का प्रतीक है।





















